वरदान – विरजन की विदाई

प्रेमचंद

वरदान

राधाचरण रूड़की कालेज से निकलते ही मुरादाबाद के इंजीनियर नियुक्त हुए और चन्द्रा  उनके संग मुरादाबाद को चली। प्रेमवती ने बहुत रोकना चाहा, पर जानेवाले को कौन  रोक  सकता  है। सेवती कब की ससुराल आ चुकी थी। यहां घर में अकेली प्रेमवती रह गई। उसके सिर  घर  का  काम-काज पडा। निदान यह राय हुई कि विरजन के गौने का संदेशा भेजा जाए। डिप्टी साहब  सहमत  न थे, परन्तु घर के कामों में प्रेमवती ही की बात चलती थी।
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वरदान – सुशीला की मृत्यु

प्रेमचंद

वरदान

तीन दिन और बीते, सुशीला के जीने की अब कोई  संभावना  न  रही।  तीनों  दिन  मुंशी संजीवनलाल उसके पास बैठे उसको सान्त्वना देते रहे। वह तनिक देर के लिए भी वहां से  किसी  काम के लिए चले जाते, तो वह व्याकुल होने लगती और रो-रोकर कहने लगती-मुझे छोड़कर कहीं  चले  गये। उनको नेत्रों के सम्मुख देखकर भी उसे संतोष न होता। रह-रहकर उतावलेपन से उनका हाथ पकड़  लेतीऔर निराश भाव से कहती-मुझे छोड़कर कहीं चले तो नहीं जाओगे  ?  मुंशीजी  यद्यपि  बड़े  दृढ-चित मनुष्य थे, तथापि ऐसी बातें सुनकयर आर्द्रनेत्र हो जाते। थोडी-थोडी देर में सुशीला को  मूर्छा-सी आ जाती। फिर चौंकती तो इधर-उधर भौंजक्की-सी देखने लगती। वे कहां गये? क्या छोड़कर  चले  गयें ? किसी-किसी बार मूर्छा का इतना प्रकोप होता कि मुंशीजी बार-बार कहते-मैं यही  हूं, घबराओं नहीं। पर उसे विश्वास न आता। उन्हीं की ओर ताकती और पूछती कि –कहां है ? यहां तो नहीं  है। कहां चले गये ? थोडी देर में जब चेत हो जाता तो चुप रह जाती और रोने लगती। तीनों दिन  उसने विरजन, सुवामा, प्रताप एक की भी सुधि न की। वे सब-के-सब हर घडी उसी के  पास  खडे  रहते, पर ऐसा जान पडता था, मानों वह मुशींजी के अतिरिक्त और किसी को पहचानती ही नहीं है।  जब विरजन बैचैन हो जाती और गले में हाथ डालकर रोने लगती, तो वह तनिक आंख खोल देती और पूछती-‘कौन है, विरजन ? बस और कुछ न पूछती। जैसे, सूम के हृदय में मरते  समय  अपने  गडे  हुए  धन  के सिवाय और किसी बात का ध्यान नहीं रहयता उसी प्रकार हिन्दू-सत्री  अन्त  समय  में  पति  के अतिरिक्त और किसी का ध्यान नहीं कर सकती।
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वरदान – ईर्ष्या

प्रेमचंद

वरदान

प्रतापचन्द्र ने विरजन के घर आना-जाना विवाह के कुछ दिन पूर्व से ही त्याग दिया  था। वह विवाह के किसी भी कार्य में सम्मिलित नहीं हुआ। यहॉ तक कि महफिल में भी न  गया।  मलिन मन किये, मुहॅ लटकाये, अपने घर बैठा रहा, मुंशी संजीवनलाला, सुशीला, सुवामा सब  बिनती  करके हार गये, पर उसने बारात की ओर दृष्टि न फेरी। अंत में मुंशीजी का मन टूट गया और फिर  कुछ  न बोले। यह दशा विवाह के होने तक थी। विवाह के पश्चात तो उसने  इधर  का  मार्ग  ही  त्याग दिया। स्कूल जाता तो इस प्रकार एक ओर से निकल जाता, मानों आगे कोई बाघ बैठा हुआ  है,  या जैसे महाजन से कोई ऋणी मनुष्य ऑख बचाकर निकल जाता है। विरजन की  तो  परछाई  से  भागता। यदि कभी उसे अपने घर में देख पाता तो भीतर पग न देता। माता समझाती-बेटा। विरजन से बोलते-चालत क्यों नहीं ? क्यों उससे यसमन मोटा किये हुए हो ? वह आ-आकर घण्टों रोती है कि मैने  क्या किया है जिससे वह रूष्ट हो गया है। देखों, तुम और वह कितने दिनों तक एक संग रहे हो।  तुम  उसे कितना प्यार करते थे। अकस्मात् तुमको क्या हो गया? यदि तुम ऐसे  ही  रूठे  रहोगे  तो  बेचारी लड़की की जान पर बन जायेगी। सूखकर कॉटा हो गया है। ईश्वर ही जानता  है,  मुझे  उसे  देखकर करूणा उत्पन्न होती है। तुम्हारी र्चचा के अतिरिक्त उसे कोई बात ही नहीं भाती।
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वरदान – सखियाँ

प्रेमचंद

वरदान

डिप्टी श्यामाचरण का भवन आज सुन्दरियों के जमघट से इन्द्र का  अखाड़ा  बना  हुआ  था। सेवती की चार सहेलियॉ-रूक्मिणी, सीता, रामदैई और  चन्द्रकुंवर-सोलहों  सिंगार  किये  इठलाती फिरती थी। डिप्टी साहब की बहिन जानकी कुंवर भी अपनी दो लड़कियों के साथ इटावे से आ  गयी थीं। इन दोनों का नाम कमला और उमादेवी था। कमला का विवाह हो चुका  था।  उमादेवी  अभी कुंवारी ही थी। दोनों सूर्य और चन्द्र थी। मंडप के तले  डौमनियां  और  गवनिहारिने  सोहर  और सोहाग, अलाप रही थी। गुलबिया नाइन और जमनी कहारिन दोनों चटकीली साडियॉ पहिने,  मांग सिंदूर से भरवाये, गिलट के कड़े पहिने छम-छम करती फिरती थीं। गुलबिया  चपला  नवयौवना  थी। जमुना की अवस्था ढल चुकी थी। सेवती का क्या पूछना? आज उसकी अनोखी छटा  थी।  रसीली  आंखें आमोदाधिक्य से मतवाली हो रही थीं और गुलाबी साड़ी की झलक से चम्पई रंग गुलाबी  जान  पड़ता था। धानी मखमल की कुरती उस पर खूब खिलती थी। अभी स्नान करके आयी थी,  इसलिए  नागिन-सी लट कंधों पर लहरा रही थी। छेड़छाड़ और चुहल से इतना अवकाश न मिलता था कि  बाल  गुंथवा ले। महराजिन की बेटी माधवी छींट का लॅहगा पहने, ऑखों में काजल लगाये, भीतर-बाहर  किये  हुए थी।
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वरदान – निठुरता और प्रेम

प्रेमचंद

वरदान

सुवामा तन-मन से विवाह की तैयारियां करने लगीं। भोर से संध्या तक विवाह के ही  धन्धों में उलझी रहती। सुशीला चेरी की भांति उसकी आज्ञा का पालन  किया  करती।  मुंशी  संजीवनलाल प्रात:काल से सांझ तक हाट की धूल छानते रहते। और विरजन जिसके लिए  यह  सब  तैयारियां  हो रही थी, अपने कमरे में बैठी हुई रात-दिन रोया करती। किसी को इतना अवकाश न था कि  क्षण-भर के लिए उसका मन बहलाये। यहॉ तक कि प्रताप भी अब उसे निठुर जान पड़ता था। प्रताप  कामन भी इन दिनों बहुत ही मलिन हो गया था। सबेरे का निकला हुआ सॉझ को घर आता  और  अपनी मुंडेर पर चुपचाप जा बैठता। विरजन के घर जाने की तो उसने शपथ-सी कर ली थी। वरन  जब  कभी वह आती हुई दिखई देती, तो चुपके से सरक जाता। यदि कहने-सुनने से बैठता भी तो इस  भांति  मुख फेर लेता और रूखाई का व्यवहार करता कि विरजन रोने लगती और सुवामा  से  कहती-चाची,  लल्लू मुझसे रूष्ट है, मैं बुलाती हूं, तो नहीं बोलते। तुम चलकर मना दो। यह कहकर वह  मचल  जाती  और  सुवामा का ऑचल पकड़कर खींचती हुई प्रताप के घर लाती। परन्तु प्रताप दोनों को देखते ही  निकल भाग्ता। वृजरानी द्वार तक यह कहती हुई आती कि-लल्लू तनिक सुन  लो,  तनिक  सुन  लो,  तुम्हें हमारी शपथ, तनिक सुन लो। पर जब वह न सुनता और न मुंह फेरकर देखता ही  तो  बेचारी  लड़की पृथ्वी पर बैठ जाती और भली-भॉती फूट-फूटकर रोती और कहती-यह मुझसे क्यों रूठे हुए है ? मैने  तो इन्हें कभी कुछ नहीं कहा। सुवामा उसे छाती से लगा लेती और समझाती-बेटा। जाने दो, लल्लू  पागल हो गया है। उसे अपने पुत्र की निठुरता का भेद कुछ-कुछ ज्ञात हो चला था।
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वरदान – डिप्टी श्यामाचरण

प्रेमचंद

वरदान

डिप्टी श्यामाचरण की धाक सारे नगर में छायी हई थी। नगर में कोई ऐसा हाकिम  न  था जिसकी लोग इतनी प्रतिष्ठा करते हों। इसका कारण कुछ तो यह था कि वे  स्वभाव  के  मिलनसार और सहनशील थे और कुछ यह कि रिश्वत से उन्हें बडी घृणा थी। न्याय-विचार ऐसी सूक्ष्मता से  करते थे कि दस-बाहर वर्ष के भीतर कदाचित उनके दो-ही चार फैसलों की अपील हुई होगी। अंग्रेजी  का एक अक्षर न जानते थे, परन्तु बैरस्टिरों और वकीलों को भी उनकी नैतिक  पहुंच  और  सूक्ष्मदर्शिता पर आश्चर्य होता था। स्वभाव में स्वाधीनता कूट-कूट भरी थी। घर  और  न्यायालय  के  अतिरिक्त किसी ने उन्हें और कहीं आते-जाते नहीं देखा। मुशीं शालिग्राम जब तक जीवित थे, या यों कहिए  कि वर्तमान थे, तब तक कभी-कभी चितविनोदार्थ उनके यह चले जाते थे। जब वे लप्त हो  गये,  डिप्टी साहब ने घर छोडकर हिलने की शपथ कर ली। कई वर्ष हुए एक बार कलक्टर साहब को  सलाम  करने  गये थे खानसामा ने कहा- साहब स्नान कर रहे हैं दो घंटे तक बरामदे में एक मोढे पर बैठे  प्रतीक्षा करते रहे। तदनन्तर साहब बहादुर हाथ में एक टेनिस बैट लिये  हुए  निकले  और  बोले-बाबू  साहब, हमको खेद है कि आपको हामारी बाट देखनी पडी। मुझे आज अवकाश नहीं है। क्लब-घर जाना है।  आप फिर कभी आवें।

यह सुनकर उन्होंने साहब बहादुर को सलाम किया  और  इतनी-सी  बात  पर  फिर  किसी अंग्रेजी की भेंट को न गये। वंश, प्रतिष्ठा और आत्म-गौरव पर उन्हें बडा अभिमान था। वे  बडे  ही रसिक पुरूष थे। उनकी बातें हास्य से पूर्ण होती थीं। संध्या के समय जब वे कतिपय विशिष्ट  मित्रों के साथ द्वारांगण में बैठते, तो उनके उच्च हास्य की गूंजती हुई प्रतिध्वनि वाटिका से सुनायी  देती थी। नौकरो-चाकरों से वे बहुत सरल व्यवहार रखते थे, यहां तक कि उनके संग अलाव के बेठने  में  भी  उनको कुछ संकोच न था। परन्तु उनकी धाक ऐसी छाई हुई थी कि उनकी इस सजनता  से  किसी  को अनूचित लाभ उठाने का साहस न होता था। चाल-ढाल सामान्य रखते थे। कोअ-पतलून से  उन्हें  घृणा थी। बटनदार ऊंची अचकयन, उस पर एक रेशमी काम की अबा, काला श्मिला, ढीला  पाजामा  और दिल्लीवाला नोकदार जूता उनकी मुख्य पोशाक थी। उनके दुहरे शरीर, गुलाबी चेहरे और मध्यम  डील  पर जितनी यह पोशाक शोभा देती थी, उनकी कोट-पतलूनसे सम्भव न थी। यद्यपि उनकी धाक  सारे नगर-भर में फैली हई थी, तथापि अपने घर के मण्डलान्तगर्त उनकी एक न चलती  थी।  यहां  उनकी सुयोग्य अद्वांगिनी का साम्राज्य था। वे अपने अधिकृत प्रान्त  में  स्वच्छन्दतापूर्वक  शासन  करती थी। कई वर्ष व्यतीत हुए डिप्टी साहब ने उनकी इच्छा के विरूद्व एक  महराजिन  नौकर  रख  ली थी। महराजिन कुछ रंगीली थी। प्रेमवती अपने पति की इस अनुचित कृति पर ऐसी रूष्ट हुई कि  कई सप्ताह तक कोपभवन में बैठी रही। निदान विवश होकर साहब ने महराजिन को विदा  कर  दिया। तब से उन्हें फिर कभी गृहस्थी के व्यवहार में हस्तक्षेप करने का साहस न हुआ।

मुंशीजी के दो बेटे और एक बेटी थी। बडा लडका साधाचरण गत वर्ष  डिग्री  प्राप्त  करके इस समय रूडकी कालेज में पढाता था। उसका विवाह फतहपुयर-सीकरी के एक रईस के यहां  हआ  था। मंझली लडकी का नाम सेवती था। उसका भी विवाह प्रयाग के एक धनी घराने में  हुआ  था।  छोटा लडका कमलाचरण अभी तक अविवाहित था। प्रेमवती ने बचपन से  ही  लाड-प्यार  करके  उसे  ऐसा बिगाड दिया था कि उसका मन पढने-लिखने में तनिक भी नहीं लगता था।  पन्द्रह  वर्ष  का  हो चुका था, पर अभी तक सीधा-सा पत्र भी न लिख सकता था। इसलिए वहां से भी वह  उठा  लिया गया। तब एक मास्टर साहब नियुक्त हुए और तीन महीने रहे परन्तु  इतने  दिनों  में  कमलाचरण  ने कठिनता से तीन पाठ पढे होंगें। निदान मास्टर साहब भी विदा हो गये।  तब  डिप्टी  साहब  ने स्वयं पढाना निश्चित किया। परन्तु एक ही सप्ताह में उन्हें कई बार कमला का  सिर  हिलाने  की आवश्यकता प्रतीत हुई। साक्षियों के बयान और वकीलों की सूक्ष्म आलोचनाओं  के  तत्व  को  समझना कठिन नहीं है, जितना किसी निरूत्साही लडके के यमन में शिक्षा-रूचित उत्पन्न करना है।

प्रेमवती ने इस मारधाड पर ऐसा उत्पात मचाया कि अन्त में डिप्टी साहब ने भी  झल्लाकर पढाना छोड दिया। कमला कुछ ऐसा रूपवान, सुकुमार और मधुरभाषी था कि माता उसे सब लडकों  से अधिक चाहती थी। इस अनुचित लाड-प्यार ने उसे पंतंग,  कबूतरबाजी  और  इसी  प्रकार  के  अन्य कुव्यसनों का प्रेमी बना दिया था। सबरे हआ और कबूतर उडाये जाने लगे, बटेरों के जोड  छूटने  लगे, संध्या हई और पंतग के लम्बे-लम्बे पेच होने लगे। कुछ दिनों में जुए  का  भी  चस्का  पड  चला  था। दपर्ण, कंघी और इत्र-तेल में तो मानों उसके प्राण ही बसते थे।

प्रेमवती एक दिन सुवामा से मिलने गयी हुई थी। वहां उसने वृजरानी को देखा और उसी दिन से उसका जी ललचाया हआ था कि वह बहू बनकर मेरे घर में आये, तो घर का भाग्य जाग  उठे।  उसने सुशीला पर अपना यह भाव प्रगट किया। विरजन का तेरहॅवा आरम्भ हो चुका  था।  पति-पत्नी  में विवाह के सम्बन्ध में बातचीत हो रही थी। प्रेमवती की इच्छा पाकर दोनों फूले न समाये। एक  तो परिचित परिवार, दूसरे कलीन लडका, बूद्विमान और शिक्षित, पैतृक  सम्पति  अधिक।  यदि  इनमें  नाता हो जाए तो क्या पूछना। चटपट रीति के अनुसार संदेश कहला भेजा।

इस प्रकार संयोग ने आज उस विषैले वृक्ष का बीज बोया, जिसने तीन ही वर्ष  में  कुल  का सर्वनाश कर दिया। भविष्य हमारी दृष्टि से कैसा गुप्त रहता है ?

ज्यों ही संदेशा पहुंचा, सास, ननद और बहू में बातें होने लगी।

बहू(चन्द्रा)-क्यों अम्मा। क्या आप इसी साल ब्याह करेंगी ?

प्रेमवती-और क्या, तुम्हारे लालाली के मानने की देर है।

बहू-कूछ तिलक-दहेज भी ठहरा

प्रेमवती-तिलक-दहेज ऐसी लडकियों के लिए नहीं ठहराया जाता।

जब तुला पर लडकी लडके के बराबर नहीं ठहरती,तभी दहेज का पासंग  बनाकर  उसे  बराबर कर देते हैं। हमारी वृजरानी कमला से बहुत भारी है।

सेवती-कुछ दिनों घर में खूब धूमधाम रहेगी। भाभी गीत गायेंगी।  हम  ढोल  बजायेंगें।  क्यों भाभी ?

चन्द्रा-मुझे नाचना गाना नहीं आता।

चन्द्रा का स्वर कुछ भद्दा था, जब गाती, स्वर-भंग हो जाता था। इसलिए  उसे  गाने  से चिढ थी।

सेवती-यह तो तुम आप ही करो। तुम्हारे गाने की तो संसार में धूम है।

चन्द्रा जल गयी, तीखी होकर बोली-जिसे नाच-गाकर दूसरों को लुभाना हो, वह  नाचना-गाना सीखे।

सेवती-तुम तो तनिक-सी हंसी में रूठ जाती हो। जरा वह गीत गाओं तो—तुम तो  श्याम  बडे बेखबर हो’। इस समय सुनने को बहुत जी चाहता है। महीनों से तुम्हारा गाना नहीं सुना।

चन्द्रा-तुम्ही गाओ, कोयल की तरह कूकती हो।

सेवती-लो, अब तुम्हारी यही चाल अच्छी नहीं लगती। मेरी अच्छी भाभी,  तनिक गाओं।

चन्द्रमा-मैं इस समय न गाऊंगी। क्यों मुझे कोई डोमनी समझ लिया है ?

सेवती-मैं तो बिन गीत सुने आज तुम्हारा पीछा न छोडूंगी।

सेवती का स्वर परम सुरीला और चिताकर्षक था। रूप और आकृति भी  मनोहर,  कुन्दन  वर्ण और रसीली आंखें। प्याली रंग की साडी उस पर खूब खिल रही थी। वह आप-ही-आप गुनगुनाने लगी:

तुम तो श्याम बडे बेखबर हो…तुम तो श्याम।

आप तो श्याम पीयो दूध के कुल्हड, मेरी तो पानी पै गुजर-पानी पै गुजर हो। तुम तो श्याम…

दूध के कुल्हड पर वह हंस पडी। प्रेमवती भी मुस्करायी,  परन्तु  चन्द्रा  रूष्ट  हो  गयी। बोली –बिना हंसी की हंसी हमें नहीं आती। इसमें हंसने की क्या बात है ?

सेवती-आओ, हम तुम मिलकर गायें।

चन्द्रा-कोयल और कौए का क्या साथ ?

सेती-क्रोध तो तुम्हारी नाक पर रहता है।

चन्द्रा-तो हमें क्यों छेडती हो ? हमें गाना नहीं आता, तो कोई  तुमसे  निन्दा  करने  तो नहीं जाता।

‘कोई’ का संकेत राधाचरण की ओर था। चन्द्रा में चाहे और गुण न  हों,  परन्तु  पति  की सेवा वह तन-मन से करती थी। उसका तनिक भी सिर धमका कि इसके प्राण निकला। उनको घर  आने में तनिक देर हुई कि वह व्याकुल होने लगी। जब से वे रूडकी चले गये, तब से  चन्द्रा  यका  हॅसना-बोलना सब छूट गया था। उसका विनोद उनके संग चला गया था। इन्हीं कारणों  से  राधाचरण  को स्त्री का वशीभूत बना दिया था। प्रेम, रूप-गुण, आदि सब त्रुटियों का पूरक है।

सेवती-निन्दा क्यों करेगा, ‘कोई’ तो तन-मन से तुम पर रीझा हुआ है।

चन्द्रा-इधर कई दिनों से चिट्ठी नहीं आयी।

सेवती-तीन-चार दिन हुए होंगे।

चन्द्रा-तुमसे तो हाथ-पैर जोड़ कर हार गयी। तुम लिखती ही नहीं।

सेवती-अब वे ही बातें प्रतिदिन कौन लिखे, कोई नयी बात हो  तो  लिखने  को  जी  भी चाहे।

चन्द्रा-आज विवाह के समाचार लिख देना। लाऊं कलम-दवात ?

सेवती-परन्तु एक शर्त पर लिखूंगी।

चन्द्रा-बताओं।

सेवती-तुम्हें श्यामवाला गीत गाना पड़ेगा।

चन्द्रा-अच्छा गा दूंगी। हॅसने को जी चाहता है न? हॅस लेना।

सेवती-पहले गा दो तो लिखूं।

चन्द्रा-न लिखोगी। फिर बातें बनाने लगोगी।

सेवती- तुम्हारी शपथ, लिख दूंगी, गाओ।

चन्द्रा गाने लगी-

तुम तो श्याम बड़े बेखबर हो।
तुम तो श्याम पीयो दूध के कूल्हड़, मेरी तो पानी पै गुजर
पानी पे गुजर हो। तुम तो श्याम बडे बेखबर हो।

अन्तिम शब्द कुछ ऐसे बेसुरे निकले कि हॅसी को रोकना कठिन हो गया। सेवती ने बहुत  रोका पर न रुक सकी। हॅसते-हॅसते पेट में बल पड़ गया। चन्द्रा ने दूसरा पद गाया:

आप तो श्याम रक्खो दो-दो लुगइयॉ,
मेरी तो आपी पै नजर आपी पै नजर हो।
तुम तो श्याम….

‘लुगइयां’ पर सेवती हॅसते-हॅसते लोट गयी। चन्द्रा ने सजल नेत्र होकर  कहा-अब  तो  बहुत हॅस चुकीं। लाऊं कागज ?

सेवती-नहीं, नहीं, अभी तनिक हॅस लेने दो।

सेवती हॅस रही थी कि बाबू कमलाचरण का बाहर से शुभागमन हुआ, पन्द्रह सोलह  वर्ष  की आयु थी। गोरा-गोरा गेहुंआ रंग। छरहरा शरीर, हॅसमुख, भड़कीले वस्त्रों से शरीर को  अलंकृत  किये, इत्र में बसे, नेत्रो में सुरमा, अधर पर मुस्कान और हाथ में बुलबुल लिये आकर चारपाई  पर बैठ  गये।

सेवती बोली’-कमलू। मुंह मीठा कराओं, तो तुम्हें ऐसे शुभ समाचार सुनायें कि सुनते ही फड़क उठो।

कमला-मुंह तो तुम्हारा आज अवश्य ही मीठा होगा। चाहे  शुभ  समाचार  सुनाओं,  चाहे  न सुनाओं। आज इस पठे ने यह विजय प्राप्त की है कि लोग दंग रह गये।

यह कहकर कमलाचरण ने बुलबुल को अंगूठे पर बिठा लिया।

सेवती-मेरी खबर सुनते ही नाचने लगोगे।

कमला-तो अच्छा है कि आप न सुनाइए। मैं तो आज यों ही नाच रहा हूं। इस पठे ने आज  नाक रख ली। सारा नगर दंग रह गया। नवाब मुन्नेखां बहुत दिनों से मेरी आंखों में चढ़े हुए थे।  एक  पास होता है, मैं उधर से निकला, तो आप कहने लगे-मियॉ, कोई पठा तैयार हो तो लाओं, दो-दो  चौंच हो जायें। यह कहकर आपने अपना पुराना बुलबुल दिखाया। मैने कहा- कृपानिधान।  अभी  तो  नहीं। परन्तु एक मास में यदि ईश्वर चाहेगा तो आपसे अवश्य एक जोड़ होगी, और बद-बद  कर  आज।  आगा शेरअली के अखाड़े में बदान ही ठहरी। पचाय-पचास रूपये की बाजी  थी।  लाखों  मनुष्य  जमा  थे। उनका पुराना बुलबुल, विश्वास मानों सेवती, कबूतर के बराबर था। परन्तु वह भी केवल फूला हुआ  न था। सारे नगर के बुलबुलो को पराजित किये बैठा था।  बलपूवर्क  लात  चलायी।  इसने  बार-बार नचाया और फिर झपटकर उसकी चोटी दबायी। उसने फिर  चोट  की।  यह  नीचे  आया।  चतुर्दिक कोलाहल मच गया- मार लिया मार लिया। तब तो मुझे भी क्रोध आया डपटकर  जो  ललकारता  हूं तो यह ऊपर और वह नीचे दबा हआ है। फिर तो उसने कितना ही सिर पटका  कि  ऊपर  आ  जाए, परन्तु इस शेयर ने ऐसा दाबा कि सिर न उठाने दिया।  नबाब  साहब  स्वयं  उपस्थित  थे।  बहुत चिल्लाये, पर क्या हो सकता है ? इसने उसे ऐसा दबोचा था जैसे बाज चिडिया को।  आखिर  बगटुट भागा। इसने पानी के उस पार तक पीछा किया, पर न पा सका। लोग विस्मय  से  दंग  हो  गये। नवाब साहब का तो मुख मलिन हो गया। हवाइयॉ उडने लगीं। रूपये हारने की तो उन्हें कुछ  चिंन्ता नहीं, क्योंकि लाखों की आय है। परन्तु नगर में जो उनकी धाक जमी हुई थी, वह जाती रही।  रोते हुए घर को सिधारे। सुनता हूं, यहां से जाते ही उन्होंने अपने बुलबुल को जीवित  ही  गाड़  दिया। यह कहकर कमलाचरण ने जेब खनखनायी।

सेवती-तो फिर खड़े क्या कर रहे हो ? आगरे वाले की दुकान पर आदमी भेजो।

कमला-तुम्हारे लिए क्या लाऊं, भाभी ?

सेवती-दूध के कुल्हड़।

कमला-और भैया के लिए ?

सेवती-दो-दो लुगइयॉ।

यह कहकर दोनों ठहका मारकर हॅसने लगे।

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वरदान – शिष्ट-जीवन के दृश्य

प्रेमचंद

वरदान

दिन जाते देर नहीं लगती। दो वर्ष व्यतीत हो गये। पण्डित मोटेराम नित्य  प्रात:  काल आत और सिद्वान्त-कोमुदी पढ़ाते, परन्त अब उनका आना केवल नियम पालने के हेतु ही  था,  क्योकि इस पुस्तक के पढ़न में अब विरजन का जी न लगता था। एक दिन मुंशी जी  इंजीनियर  के  दफतर  से आये। कमरे में बैठे थे। नौकर जूत का फीता खोल रहा था कि रधिया महर मुस्कराती हुई  घर  में  से निकली और उनके हाथ में मुह छाप लगा हुआ लिफाफा रख, मुंह फेर हंसने लगी। सिरना पर लिखा  हुआ था-श्रीमान बाबा साह की सेवा में प्राप्त हो।

मुंशी-अरे, तू किसका लिफाफा ले आयी ?  यह मेरा नहीं है।

महरी- सरकार ही का तो है, खोले तो आप।

मुंशी-किसने हुई बोली- आप खालेंगे तो पता चल जायेगा।

मुंशी जी ने विस्मित होकर लिफाफा खोला। उसमें से जो पञ-निकला उसमें यह लिखा हुआ था-
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वरदान – एकता का सम्बन्ध पुष्ट होता है

प्रेमचंद

वरदान

कुछ काल से सुवामा ने द्रव्याभाव के कारण महाराजिन, कहार और दो महरियों  को  जवाब दे दिया था क्योंकि अब न तो उसकी कोई आवश्यकता थी और न उनका व्यय ही संभाले संभलता  था। केवल एक बुढ़िया महरी शेष रह गयी थी। ऊपर का काम-काज वह करती रसोई  सुवामा  स्वयं  बना लेगी। परन्तु उस बेचारी को ऐसे कठिन परिश्रम का अभ्यास तो कभी था नहीं, थोड़े ही  दिनों  में उसे थकान के कारण रात को कुछ ज्वर रहने लगा।  धीरे-धीरे  यह  गति  हुई  कि  जब  देखें  ज्वर विद्यमान है। शरीर भुना जाता है, न खाने की इच्छा है न पीने की। किसी  कार्य  में  मन  नहीं लगता। पर यह है कि सदैव नियम के अनुसार काम किये जाती है। जब तक प्रताप घर रहता  है  तब तक वह मुखाकृति को तनिक भी मलिन नहीं होने देती परन्तु ज्यों ही वह स्कूल चला जाता है,  त्यों ही वह चद्दर ओढ़कर पड़ी रहती है और दिन-भर पड़े-पड़े कराहा करती है।

प्रताप बुद्विमान लड़का था। माता की दशा प्रतिदिन बिगड़ती हुई देखकर ताड  गया  कि यह बीमार है। एक दिन स्कूल से लौटा तो सीधा अपने घर गया। बेटे को देखते ही  सुवामा  ने  उठ बैठने का प्रयत्न किया पर निर्बलता के कारण मूर्छा आ गयी और हाथ-पांव अकड़  गये।  प्रताप  ने उसं संभाला और उसकी और भर्त्सना की दृष्टि से देखकर कहा-अम्मा तुम  आजकल  बीमार  हो  क्या? इतनी दुबली क्यों हो गयी हो? देखो, तुम्हारा शरीर कितना गर्म है। हाथ नहीं रखा जाता। Continue reading

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वरदान – नये पड़ोसियों से मेल-जोल

प्रेमचंद

वरदान

मुंशी संजीवनलाल, जिन्होंने सुवाम का घर भाड़े पर लिया था, बड़े  विचारशील  मनुष्य  थे। पहले एक प्रतिष्ठित पद पर नियुक्त थे, किन्तु अपनी स्वतंत्र इच्छा के कारण अफसरों को प्रसन्न  न रख सके। यहां तक कि उनकी रुष्टता से विवश होकर इस्तीफा दे दिया। नौकर के समय में  कुछ  पूंजी एकत्र कर ली थी, इसलिए नौकरी छोड़ते ही वे ठेकेदारी की ओर प्रवृत्त हुए और  उन्होंने  परिश्रम द्वारा अल्पकाल में ही अच्छी सम्पत्ति बना ली। इस समय उनकी आय चार-पांच सौ मासिक  से  कम न थी। उन्होंने कुछ ऐसी अनुभवशालिनी बुद्वि पायी थी कि जिस कार्य में हाथ डालते,  उसमें  लाभ छोड़ हानि न होती थी।

मुंशी संजीवनलाल का कुटुम्ब बड़ा न था। सन्तानें तो ईश्वर ने कई दीं, पर इस समय  माता-पिता के नयनों की पुतली केवल एक पुञी ही थी। उसका  नाम  वृजरानी  था।  वही  दम्पति  का जीवनाश्राम थी।
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वरदान – वैराग्य

प्रेमचंद
वरदान

मुंशी शालिग्राम बनारस के पुराने रईस थे। जीवन-वृति वकालत थी और  पैतृक  सम्पत्ति  भी अधिक थी। दशाश्वमेध घाट पर उनका वैभवान्वित गृह आकाश को स्पर्श करता था।  उदार  ऐसे  कि पचीस-तीस हजार की वाषिर्क आय भी व्यय  को  पूरी  न  होती  थी।  साधु-ब्राहमणों  के  बड़े श्रद्वावान थे। वे जो कुछ कमाते, वह स्वयं ब्रह्रमभोज और साधुओं के भंडारे एवं  सत्यकार्य  में  व्यय हो जाता। नगर में कोई साधु-महात्मा आ जाये, वह मुंशी जी का अतिथि। संस्कृत  के  ऐसे  विद्वान कि बड़े-बड़े पंडित उनका लोहा मानते थे वेदान्तीय सिद्वान्तों के वे अनुयायी थे।  उनके  चित्त  की प्रवृति वैराग्य की ओर थी।

मुंशीजी को स्वभावत: बच्चों से बहुत प्रेम था।  मुहल्ले-भर  के  बच्चे  उनके  प्रेम-वारि  से अभिसिंचित होते रहते थे। जब वे घर से निकलते थे तब बालाकों का एक दल उसके  साथ  होता  था। एक दिन कोई पाषाण-हृदय माता अपने बच्वे को मार थी। लड़का  बिलख-बिलखकर  रो  रहा  था। मुंशी जी से न रहा गया। दौड़े, बच्चे को गोद में उठा लिया  और  स्त्री  के  सम्मुख  अपना  सिर झुक दिया। स्त्री ने उस दिन से अपने लड़के को न मारने की शपथ  खा  ली  जो  मनुष्य  दूसरो  के बालकों का ऐसा स्नेही हो, वह अपने बालक को कितना प्यार करेगा, सो अनुमान से बाहर है।  जब से पुत्र पैदा हुआ, मुंशी जी संसार के सब कार्यो से अलग हो गये। कहीं वे लड़के को हिंडोल  में  झुला रहे हैं और प्रसन्न हो रहे हैं। कहीं वे उसे एक सुन्दर सैरगाड़ी में बैठाकर स्वयं खींच रहे हैं। एक  क्षण के लिए भी उसे अपने पास से दूर नहीं करते थे। वे बच्चे के स्नेह में अपने को भूल गये थे।
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