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	<description>हिंदी साहित्य की जननिधि</description>
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		<title>वरदान &#8211; विदुषी वृजरानी</title>
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		<pubDate>Sun, 21 Aug 2011 15:19:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>&#2360;&#2306;&#2332;&#2351;</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रेमचंद]]></category>
		<category><![CDATA[premchand]]></category>
		<category><![CDATA[vardan]]></category>

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		<description><![CDATA[जब से मुंशी संजीवनलाल तीर्थ यात्रा को निकले और प्रतापचन्द्र  प्रयाग  चला  गया  उस समय से सुवामा के जीवन में बड़ा अन्तर हो गया था। वह ठेके के कार्य को उन्नत करने  लगी।  मुंशी संजीवनलाल के समय में भी व्यापार में इतनी उन्नति नहीं हुई थी। सुवामा रात-रात भर बैठी  ईंट-पत्थरों से माथा लड़ाया करती और गारे-चूने की चिंता में व्याकुल  रहती।  पाई-पाई  का  हिसाब समझती और कभी-कभी स्वयं कुलियों के कार्य की देखभाल करती। इन कार्यो में उसकी  ऐसी  प्रवृति हुई कि दान और व्रत से भी वह पहले का-सा प्रेम न रहा। प्रतिदिन  आय  वृद्वि  होने  पर  भी सुवामा ने व्यय किसी प्रकार का न बढ़ाया। कौड़ी-कौड़ी दाँतो से पकड़ती और यह सब इसलिए  कि प्रतापचन्द्र धनवान हो जाए और अपने जीवन-पर्यन्त सान्नद रहे। <a href="http://hindikosh.in/archives/261">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a title="प्रेमचंद" href="http://hindikosh.in/premchand"><strong>प्रेमचंद</strong></a></p>
<p><a title="वरदान" href="http://hindikosh.in/premchand/vardan"><strong>वरदान</strong></a></p>
<p>जब से मुंशी संजीवनलाल तीर्थ यात्रा को निकले और प्रतापचन्द्र  प्रयाग  चला  गया  उस समय से सुवामा के जीवन में बड़ा अन्तर हो गया था। वह ठेके के कार्य को उन्नत करने  लगी।  मुंशी संजीवनलाल के समय में भी व्यापार में इतनी उन्नति नहीं हुई थी। सुवामा रात-रात भर बैठी  ईंट-पत्थरों से माथा लड़ाया करती और गारे-चूने की चिंता में व्याकुल  रहती।  पाई-पाई  का  हिसाब समझती और कभी-कभी स्वयं कुलियों के कार्य की देखभाल करती। इन कार्यो में उसकी  ऐसी  प्रवृति हुई कि दान और व्रत से भी वह पहले का-सा प्रेम न रहा। प्रतिदिन  आय  वृद्वि  होने  पर  भी सुवामा ने व्यय किसी प्रकार का न बढ़ाया। कौड़ी-कौड़ी दाँतो से पकड़ती और यह सब इसलिए  कि प्रतापचन्द्र धनवान हो जाए और अपने जीवन-पर्यन्त सान्नद रहे।<br />
<span id="more-261"></span><br />
सुवामा को अपने होनहार पुत्र पर अभिमान था।  उसके जीवन की गति देखकर उसे  विश्वास हो गया था कि मन में जो अभिलाषा रखकर मैंने पुत्र माँगा था, वह अवश्य पूर्ण होगी। वह  कालेज के प्रिंसिपल और प्रोफेसरों से प्रताप का समाचार गुप्त रीति  से  लिया  करती  थी  ओर  उनकी सूचनाओं का अध्ययन उसके लिए एक रसेचक कहानी के तुल्य था। ऐसी दशा में प्रयाग  से  प्रतापचन्द्र को लोप हो जाने का तार पहुँचा मानों उसके हुदय पर वज्र का गिरना  था।  सुवामा  एक  ठण्डी साँसे ले, मस्तक पर हाथ रख बैठ गयी। तीसरे दिन प्रतापचन्द्र की पुस्त, कपड़े और सामग्रियाँ  भी आ पहुँची, यह घाव पर नमक का छिड़काव था।</p>
<p>प्रेमवती के मरे का समाचार पाते ही प्राणनाथ पटना से और राधाचरण  नैनीताल  से  चले। उसके जीते-जी आते तो भेंट हो जाती, मरने पर आये तो उसके शव को भी देखने को सौभाग्य  न  हुआ। मृतक-संस्कार बड़ी धूम से किया  गया।  दो  सप्ताह  गाँव  में  बड़ी  धूम-धाम  रही।  तत्पश्चात् मुरादाबाद चले गये और प्राणनाथ ने पटना जाने की तैयारी प्रारम्भ कर दी। उनकी इच्छा थी  कि स्त्रीको प्रयाग पहुँचाते हुए पटना जायँ। पर सेवती ने हठ किया कि जब  यहाँ  तक  आये  हैं,  तो विरजन के पास भी अवश्य चलना चाहिए नहीं तो उसे बड़ा दु:ख होगा।  समझेगी  कि  मुझे  असहाय जानकर इन लोगों ने भी त्याग दिया।</p>
<p>सेवती का इस उचाट भवन मे आना मानो पुष्पों में सुगन्ध में आना था। सप्ताह  भर  के  लिए सुदिन का शुभागमन हो गया। विरजन बहुत प्रसन्न हुई और खूब रोयी। माधवी ने मुन्नू  को  अंक  में लेकर बहुत प्यार किया।</p>
<p>प्रेमवती के चले जाने पर विरजन उस गृह में अकेली रह गई थी। केवल माधवी उसके पास  थी। हृदय-ताप और मानसिक दु:ख ने उसका वह गुण प्रकट कर दिया, जा अब तक गुप्त  था।  वह  काव्य और पद्य-रचना का अभ्यास करने लगी। कविता सच्ची भावनाओं का चित्र  है  और  सच्ची  भावनाएँ चाहे वे दु:ख हों या सुख की, उसी समय सम्पन्न होती हैं जब हम दु:ख या सुख का अनुभव  करते  हैं। विरजन इन दिनों रात-रात बैठी भाष में अपने मनोभावों के मोतियों की माला गूँथा करती।  उसका एक-एक शब्द करुणा और वैराग्य से परिवूर्ण होता थां अन्य कवियों के मनों में मित्रों की  वहा-वाह और काव्य-प्रेतियों के साधुवाद से उत्साह पैदा होता है, पर विरजन अपनी दु:ख कथा अपने ही  मन को सुनाती थी।</p>
<p>सेवती को आये दो- तीन दिन बीते थे। एक दिन विरजन से  कहा-  मैं  तुम्हें  बहुधा  किसी ध्यान में मग्न देखती हूँ और कुछ लिखते भी पाती हूँ। मुझे न बताओगी?  विरजन  लज्जित  हो  गयी। बहाना करने लगी कि कुछ नहीं, यों ही जी कुछ उदास रहता है। सेवती ने कहा-मैंन  मानूँगी।  फिर वह विरजनका बाक्स उठा लायी, जिसमें कविता के दिव्य मोती रखे हुए थे। विवश होकर विरजन  ने अपने नय पद्य सुनाने शुरु किये। मुख से प्रथम पद्य का निकलना था कि सेवती के रोएँ  खड़े  हो  गये और जब तक सारा पद्य समाप्त न हुआ, वह तन्मय होकर सुनती रही। प्राणनाथ की  संगति  ने  उसे काव्य का रसिक बना दिया था। बार-बार उसके नेत्र भर आते। जब विरजन चुप हो  गयी  तो  एक समाँ बँधा हुआ था मानों को कोई मनोहर राग अभी थम गया है। सेवती  ने  विरजन  को  कण्ठ  से लिपटा लिया, फिर उसे छोड़कर दौड़ी हुई  प्राणनाथ के पास गयी, जैसे  कोई  नया  बच्चा  नया खिलोना पाकर हर्ष से दौड़ता हुआ अपने साथियों को दिखाने जाता है। प्राणनाथ अपने  अफसर  को प्रार्थना-पत्र लिख रहे थे कि मेरी माता अति पीड़िता हो गयी है, अतएव सेवा में  प्रस्तुत  होने में विलम्ब हुआ। आशा करता हूँ कि एक सप्ताह का आकस्मिक अवकाश प्रदान  किया  जायगा।  सेवती को देखकर चट आपना प्रार्थना-पत्र छिपा लिया और मुस्कराये। मनुष्य  कैसा  धूर्त  है!  वह  अपने आपको भी धोख देने से नहीं चूकता।</p>
<p>सेवती- तनिक भीतर चलो, तुम्हें विरजन की कविता सुनवाऊं, फड़क उठोगे।</p>
<p>प्राण0- अच्छा, अब उन्हें कविता की चाट हुई है? उनकी भाभी तो गाया करती थी –  तुम<br />
तो श्याम बड़े बेखबर हो।</p>
<p>सेवती- तनिक चलकर सुनो, तो पीछे हॅंसना। मुझे तो उसकी कविता पर आश्चर्य हो रहा  है।</p>
<p>प्राण0- चलो, एक पत्र लिखकर अभी आता हूं।</p>
<p>सेवती- अब यही मुझे अच्छा नहीं लगता। मैं आपके पत्र नोच डालूंगी।</p>
<p>सेवती प्राणनाथ को घसीट ले आयी। वे अभी तक यही जानते थे कि विरजन ने कोई  सामान्य भजन बनाया होगा। उसी को सुनाने के लिए व्याकुल हो रही होगी। पर जब भीतर  आकर  बैठे  और विरजन ने लजाते हुए अपनी भावपूर्ण कविता ‘प्रेम की मतवाली’ पढ़नी आरम्भ की  तो  महाशय  के नेत्र खुल गये। पद्य क्या था, हृदय के दुख की एक धारा और प्रेम –रहस्य की  एक  कथा  थी।  वह सुनते थे और मुग्ध होकर झुमते थे। शब्दों की एक-एक योजना  पर,  भावों  के  एक-एक  उदगार  पर लहालोट हुए जाते थे। उन्होंने बहुतेरे कवियां के काव्य देखे थे, पर यह उच्च  विचार,  यह  नूतनता, यह भावोत्कर्ष कहीं दीख न पड़ा था। वह समय चित्रित  हो  रहा  था  जब  अरुणोदय  के  पूर्व मलयानिल लहराता हुआ चलता है, कलियां विकसित होती हैं, फूल महकते हैं  और  आकाश  पर  हल्की लालिमा छा जाती है। एक –एक शब्द में नवविकसित पुष्पों की शोभा और हिमकिरणों  की  शीतलता विद्यमान थी। उस पर विरजन का सुरीलापन और ध्वनि की मधुरता सोने में सुगन्ध थी। ये छन्द  थे, जिन पर विरजन ने हृदय को दीपक की भॉँति जलाया था। प्राणनाथ प्रहसन के उद्देश्य से  आये  थे। पर जब वे उठे तो वस्तुत: ऐसा प्रतीत होता था, मानो छाती से हृदय निकल गया  है।  एक  दिन उन्होंने विरजन से कहा- यदि तुम्हारी कविताऍं छपे, तो उनका बहुत आदर हो।</p>
<p>विरजन ने सिर नीचा करके कहा- मुझे विश्वास नहीं कि कोई  इनको पसन्द करेगा।</p>
<p>प्राणनाथ- ऐसा संभव ही नहीं। यदि हृदयों में कुछ भी रसिकता है तो  तुम्हारे  काव्य  की अवश्य प्रतिष्ठा होगी। यदि ऐसे लोग विद्यमान हैं, जो पुष्पों की सुगन्ध से आनन्दित हो जाते  हैं, जो पक्षियों के कलरव और चाँदनी की मनोहारिणी छटा का आनन्द उठा सकते हैं,  तो  वे  तुम्हारी कविता को अवश्य हृदय में स्थान देंगे। विरजन के ह्दय मे वह गुदगुदी उत्पन्न हुई  जो  प्रत्येक  कवि को अपने काव्यचिन्तन की प्रशंसा मिलने पर, कविता के मुद्रित  होने  के  विचार  से  होती  है। यद्यपि  वह नहीं–नहीं करती रही, पर वह, ‘नहीं’, ‘हाँ’ के समान थी। प्रयाग  से  उन  दिनों ‘कमला’ नाम  की अच्छी पत्रिका निकलती थी। प्राणनाथ ने ‘प्रेम की  मतवाली’  को  वहां  भेज दिया। सम्पादक एक काव्य–रसिक महानुभाव थे कविता पर हार्दिक धन्यवाद  दिया  ओर  जब  यह कविता प्रकाशित हुई, तो साहित्य–संसार में धूम मच गयी। कदाचित ही किसी कवि को प्रथम  ही बार ऐसी ख्याति मिली हो। लोग पढते और विस्मय से एक-दूसरे का मुंह ताकते  थे।  काव्य–प्रेमियों मे कई सप्ताह तक मतवाली बाला के चर्चे रहे। किसी को विश्वास ही न  आता  था  कि  यह  एक नवजात कवि की रचना है। अब प्रति मास ‘कमला’ के पृष्ठ विरजन की कविता  से  सुशोभित  होने लगे और ‘भारत महिला’ को लोकमत ने कवियों के सम्मानित पद पर पहुंचा दिया। ‘भारत  महिला’ का नाम बच्चे-बच्चे की जिहवा पर चढ गया। को इस समाचार-पत्र या पत्रिका  ‘भारत  महिला’ को ढूढने लगते। हां, उसकी दिव्य शक्तिया अब किसी को विस्मय में न डालती  उसने  स्वयं  कविता का आदर्श उच्च कर दिया था।</p>
<p>तीन वर्ष तक किसी को कुछ भी पता न लगा कि ‘भारत महिला’ कौन है।  निदान  प्राण नाथ से न रहा गया। उन्हें विरजन पर भक्ति  हो गयी थी। वे कई मांस से उसका  जीवन–चरित्र लिखने की धुन में थे। सेवती के द्वारा धीरे-धीरे  उन्होनें उसका  सब  जीवन  चरित्र   ज्ञात  कर दिया और ‘भारत महिला’ के शीर्षक से एक प्रभाव–पूरित लेख लिया। प्राणनाथ ने  पहिले  लेख  न लिखा था, परन्तु श्रद्वा ने अभ्यास की कमी पूरी कर दी थी। लेख अतयन्त रोचक,  समालोचनात्मक और भावपूर्ण था।</p>
<p>इस लेख का मुदित होना था कि विरजन  को चारों तरफ से  प्रतिष्ठा  के  उपहार  मिलने लगे। राधाचरण मुरादाबाद से उसकी भेंट को आये। कमला, उमादेवी, चन्द्रकुवंर और सखिया  जिन्होनें उसे विस्मरण कर दिया था प्रतिदिन  विरजन के दशर्नों  को आने लगी। बडे बडे   गणमान्य  सज्ज्न जो ममता  के अभीमान से  हकिमों के सम्मुख सिर न झुकाते, विरजन के द्वार पर  दशर्न   को  आते थे। चन्द्रा स्वयं तो न आ सकी, परन्तु  पत्र में लिखा – जो चाहता है कि तुम्हारे चरणें  पर  सिर रखकर घंटों रोऊँ।</p>
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		<title>वरदान &#8211; मन का प्राबल्य</title>
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		<pubDate>Sun, 21 Aug 2011 15:18:16 +0000</pubDate>
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				<category><![CDATA[प्रेमचंद]]></category>
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		<description><![CDATA[मानव हृदय एक रहस्यमय वस्तु है। कभी तो वह लाखों की ओर ऑख उठाकर  नहीं  देखता  और कभी कौड़ियों पर फिसल पड़ता है। कभी सैकड़ों निर्दषों की हत्या पर आह ‘तक’  नहीं  करता  और कभी एक बच्चे को देखकर रो देता है। प्रतापचन्द्र और कमलाचरण में यद्यपि सहोदर भाइयों  का-सा प्रेम था, तथापि कमला की आकस्मिक मृत्यु का जो शोक चाहिये वह न हुआ। सुनकर वह  चौंक  अवश्य पड़ा और थोड़ी देर के लिए उदास भी हुआ, पर शोक जो किसी सच्चे मित्र की मृत्यु से होता है  उसे न हुआ। निस्संदेह वह विवाह के पूर्व ही से विरजन को अपनी समझता था तथापि इस विचार में  उसे पूर्ण सफलता कभी प्राप्त न हुई। समय-समय पर उसका विचार इस पवित्र सम्बन्ध  की  सीमा  का उल्लंघन कर जाता था। <a href="http://hindikosh.in/archives/259">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a title="प्रेमचंद" href="http://hindikosh.in/premchand"><strong>प्रेमचंद</strong></a></p>
<p><a title="वरदान" href="http://hindikosh.in/premchand/vardan"><strong>वरदान</strong></a></p>
<p>मानव हृदय एक रहस्यमय वस्तु है। कभी तो वह लाखों की ओर ऑख उठाकर  नहीं  देखता  और कभी कौड़ियों पर फिसल पड़ता है। कभी सैकड़ों निर्दषों की हत्या पर आह ‘तक’  नहीं  करता  और कभी एक बच्चे को देखकर रो देता है। प्रतापचन्द्र और कमलाचरण में यद्यपि सहोदर भाइयों  का-सा प्रेम था, तथापि कमला की आकस्मिक मृत्यु का जो शोक चाहिये वह न हुआ। सुनकर वह  चौंक  अवश्य पड़ा और थोड़ी देर के लिए उदास भी हुआ, पर शोक जो किसी सच्चे मित्र की मृत्यु से होता है  उसे न हुआ। निस्संदेह वह विवाह के पूर्व ही से विरजन को अपनी समझता था तथापि इस विचार में  उसे पूर्ण सफलता कभी प्राप्त न हुई। समय-समय पर उसका विचार इस पवित्र सम्बन्ध  की  सीमा  का उल्लंघन कर जाता था। कमलाचरण से उसे स्वत: कोई प्रेम न था। उसका जो  कुछ  आदर,  मान   और प्रेम वह करता था, कुछ तो इस विचार से कि विरजन सुनकर प्रसन्न होगी और इस विचार  से  कि सुशील की मृत्यु का प्रायश्चित इसी प्रकार हो सकता है। जब  विरजन  ससुराल  चली  आयी,  तो अवश्य कुछ दिनों प्रताप ने उसे अपने ध्यान में न आने दिया, परन्तु जब से वह  उसकी  बीमारी  का समाचार पाकर बनारस गया था और उसकी भेंट ने विरजन पर संजीवनी बूटी का  काम  किया  था, उसी दिन से प्रताप को विश्वास हो गया था कि विरजन के हृदय में  कमला  ने  वह  स्थान  नहीं पाया जो मेरे लिए नियत था।<br />
<span id="more-259"></span><br />
प्रताप ने विरजन को परम करणापूर्ण शोक-पत्र लिखा पर  पत्र  लिख्ता  जाता  था  और सोचता जाता था कि इसका उस पर क्या प्रभाव होगा?  सामान्यत:  समवेदना  प्रेम  को  प्रौढ़ करती है। क्या आश्चर्य है जो यह पत्र कुछ काम कर जाय? इसके अतिरिक्त उसकी  धार्मिक  प्रवृति ने विकृत रुप धारण करके उसके मन में यह मिथ्या विचार उत्पन्न किया कि ईश्वर ने  मेरे  प्रेम  की प्रतिष्ठा की और कमलाचरण को मेरे मार्ग से हटा दिया, मानो यह आकाश से आदेश  मिला  है  कि अब मैं विरजन से अपने प्रेम का पुरस्कार लूँ। प्रताप यह जो जानता था कि विरजन से  किसी  ऐसी बात की आशा करना, जो सदाचार और सभ्यता से बाल बराबर भी हटी हुई हो, मूर्खता है।  परन्तु उसे विश्वास था कि सदाचार और सतीत्व के सीमान्तर्गत यदि मेरी कामनाएँ  पूरी  हो  सकें,  तो विरजन अधिक समय तक मेरे साथ निर्दयता नहीं कर सकती।</p>
<p>एक मास तक ये विचार उसे उद्विग्न करते रहे। यहाँ तक कि उसके मन में विरजन से एक  बार गुप्त भेंट करने की प्रबल इच्छा भी उत्पन्न हुई। वह यह जानता था कि अभी विरजन  के  हृदय  पर तात्कालिकघव है और यदि मेरी किसी बात या किसी व्यवहार से मेरे मन  की  दुश्चेष्टा  की  गन्ध निकली, तो मैं विरजन की दृष्टि से हमश के लिए गिर जाँऊगा।  परन्तु  जिस  प्रकार  कोई  चोर रुपयों की राशि देखकर धैर्य नहीं रख सकता है, उसकी प्रकार प्रताप अपने मन को न  रोक  सका। मनुष्य का प्रारब्ध बहुत कुछ अवसर के हाथ से रहता है। अवसर उसे भला नहीं मानता  है  और  बुरा भी। जब तक कमलाचरण जीवित था, प्रताप के मन में कभी इतना सिर उठाने को साहस न हुआ  था। उसकी मृत्यु ने मानो उसे यह अवसर दे दिया। यह स्वार्थपता का मद यहाँ तक बढ़ा  कि  एक  दिन उसे ऐसाभस होने लगा, मानों विरजन मुझे स्मरण कर रही है। अपनी व्यग्रता  से  वह  विरजन  का अनुमान करेन लगा। बनारस जाने का इरादा पक्का हो गया।</p>
<p>दो बजे थे। रात्रि का समय था। भयावह सन्नाटा छाया हुआ था। निद्रा ने सारे नगर  पर एक घटाटोप चादर फैला रखी थी। कभी-कभी वृक्षों की सनसनाहट सुनायी दे जाती  थी।  धुआं  और वृक्षों पर एक काली चद्दर की भाँति लिपटा हुआ था और सड़क पर लालटेनें धुऍं की कालिमा में  ऐसी दृष्टि  गत होती थीं जैसे बादल में छिपे हुए तारे। प्रतापचन्द्र  रेलगाड़ी  पर  से  उतरा।  उसका कलेजा बांसों उछल रहा था और हाथ-पाँव काँप रहे थे। वह जीवन में पहला ही अवसर  था  कि  उसे पाप का अनुभव हुआ! शोक है कि  हृदय की यह दशा अधिक समय तक स्थिर नहीं रहती। वह दुर्गन्ध-मार्ग को पूरा कर लेती है। जिस मनुष्य ने कभी मदिरा नहीं पी, उसे उसकी दुर्गन्ध से घृणा  होती है। जब प्रथम बार पीता है, तो घण्टें उसका मुख कड़वा रहता है और वह आश्चर्य करता है कि  क्यों लोग ऐसी विषैली और कड़वी वस्तु पर आसक्त हैं। पर थोड़े ही दिनों में उसकी घृणा दूर हो जाती  है और वह भी लाल रस का दास बन जाता है। पाप का स्वाद मदिरा से कहीं अधिक भंयकर होता है।</p>
<p>प्रतापचन्द्र अंधेरे में धीरे-धीरे जा रहा था। उसके पाँव पेग से नहीं उठते थे क्योंकि पाप  ने उनमें बेड़ियाँ डाल दी थी। उस आहलाद का, जो ऐसे अवसर पर गति को तीव्र कर  देता  है,  उसके मुख पर कोई लक्षण न था। वह चलते-चलते रुक जाता और कुछ सोचकर आगे बढ़ता था। प्रेत  उसे  पास के खड्डे में कैसा लिये जाता है?</p>
<p>प्रताप का सिर धम-धम कर रहा था और भय से उसकी पिंडलियाँ काँप रही  थीं।  सोचता-विचारता घण्टे भर में मुन्शी श्यामाचरण के विशाल भवन के सामने जा पहुँचा। आज  अन्धकार  में  यह भवन बहुत ही भयावह प्रतीत होता था, मानो पाप का पिशाच सामने खड़ा  है।  प्रताप  दीवार की ओट में खड़ा हो गया, मानो किसी ने उसक पाँव बाँध दिये हैं। आध घण्टे तक  वह  यही  सोचता रहा कि लौट चलूँ या भीतर जाँऊ?  यदि किसी ने देख लिया बड़ा ही अनर्थ  होगा।  विरजन  मुझे देखकर मन में क्या सोचेगी?  कहीं ऐसा न हो कि मेरा यह व्यवहार मुझे सदा के लिए  उसकी  दृष्टि से गिरा दे। परन्तु इन सब सन्देहों पर पिशाच का आकर्षण प्रबल हुआ।  इन्द्रियों के वश  में  होकर मनुष्य को भले-बुरे का ध्यान नहीं रह जाता। उसने चित्त को दृढ़ किया। वह इस कायरता पर  अपने को धिक्कार देने लगा, तदन्तर घर में पीछे की ओर जाकर वाटिका की चहारदीवारी से फाँद  गया। वाटिका से घर जाने  के लिए एक छोटा-सा द्वार था। दैवयेग से  वह  इस  समय  खुला  हुआ  था। प्रताप को यह शकुन-सा प्रतीत हुआ। परन्तु वस्तुत: यह अधर्म का  द्वार  था।  भीतर  जाते  हुए प्रताप के हाथ थर्राने लगे। हृदय इस वेग से धड़कता था; मानो वह छाती से बाहर  निकल  पड़ेगा। सका दम घुट रहा था। धर्म ने अपना सारा बल लगा दिया। पर मन का प्रबल वेग न  रुक  सका। प्रताप द्वार के भीतर प्रविष्ट हुआ। आंगन में तुलसी के चबूतरे के पास चोरों की भाति  खड़ा  सोचने लगा कि विरजन से क्योंकर भेंट होगी?  घर के सब किवाड़ बन्द है? क्या विरजन भी यहाँ  से  चली गयी?  अचानक उसे एक बन्द दरवाजे की दरारों से प्रेकाश की झलक दिखाई  दी।  दबे  पाँव  उसी दरार में ऑंखें लगाकर भीतर का दृश्य देखने लगा।</p>
<p>विरजन एक सफेद साड़ी पहले, बाल खोले, हाथ में लेखनी लिये भूमि पर बैठी थी और  दीवार की ओर देख-देखकर कागेज पर लिखती जाती थी, मानो कोई कवि विचार के समुद्र से मोती  निकाल रहा है। लखनी दाँतों तले दबाती, कुछ सोचती और लिखती फिर थोड़ी देर के  पश्चात्  दीवार  की ओर ताकने लगती। प्रताप बहुत देर तक श्वास रोके हुए यह विचित्र दृश्य देखता रहा। मन उसे बार-बार ठोकर देता, पर यह र्धम का अन्तिम गढ़ था। इस बार धर्म का पराजित होना मानो  हृदाममें पिशाच का स्थान पाना था। धर्म ने इस समय प्रताप को उस खड्डे में  गिरने  से  बचा  लिया, जहाँ से आमरण उसे निकलने का सौभाग्य न होता। वरन् यह कहना उचित होगा कि पाप के  खड्डे  सेबचानेवाला इस समय धर्म न था, वरन् दुष्परिणाम और लज्जा का भय ही  था।  किसी-किसी  समय जब हमारे सदभाव पराजित हो जाते हैं, तब दुष्परिणाम का भय ही हमें कर्त्तव्यच्युत होने  से  बचा लेता है। विरजन को पीले बदन पर एक ऐसा तेज था, जो उसके हृदय की स्वच्छता  और  विचार  की उच्चता का परिचय दे रहा था। उसके मुखमण्डल की उज्ज्वलता और दृष्टि की पवित्रता में वह  अग्नि थी ; जिसने प्रताप की दुश्चेष्टाओं को क्षणमात्र में भस्म कर दिया ! उसे ज्ञान हो गया और  अपने आत्मिक पतन पर ऐसी लज्जा उत्पन्न हुई कि वहीं खड़ा रोने लगा।</p>
<p>इन्द्रियों ने जितने निकृष्ट विकार उसके हृदय में उत्पन्न कर दिये थे, वे सब इस दृश्य ने  इस प्रकार लोप कर दिये, जैसे उजाला अंधेरे को दूर कर देता है। इस  समय  उसे  यह  इच्छा  हुई  कि विरजन के चरणों पर गिरकर अपने अपराधों की क्षमा माँगे। जैसे किसी महात्मा संन्यासी  के  सम्मुख जाकर हमारे चित्त की दशा हो जाती है, उसकी प्रकार प्रताप के हृदय में  स्वत:  प्रायश्चित  के विचार उत्पन्न हुए। पिशाच यहाँ तक लाया, पर आगे न ले जा सका। वह  उलटे  पाँवों  फिरा  और ऐसी तीव्रता से वाटिका में आया और चाहरदीवारी से कूछा, मानो उसका कोई पीछा करता है।</p>
<p>अरूणोदय का समय हो गया था, आकाश मे तारे झिलमिला रहे थे और चक्की का घुर-घुर  शब्द कर्णगोचर हो रहा था। प्रताप पाँव दबाता, मनुष्यों की  ऑंखें  बचाता  गंगाजी  की  ओर  चला। अचानक उसने सिर पर हाथ रखा तो टोपी का पता न था और जेब जेब में घड़ी  ही  दिखाई   दी। उसका कलेजा सन्न-से हो गया। मुहॅ से एक हृदय-वेधक आह निकल पड़ी।</p>
<p>कभी-कभी जीवन में ऐसी घटनाँए हो जाती है, जो क्षणमात्र में मनुष्य का  रुप  पलट  देती है। कभी माता-पिता की एक तिरछी चितवन पुत्र को सुयश के उच्च शिखर पर पहुँचा  देती  है  और कभी स्त्री की एक शिक्षा पति के ज्ञान-चक्षुओं को खोल देती है। गर्वशील  पुरुष  अपने  सगों  की दृष्टियों में अपमानित होकर संसार का भार  बनना  नहीं  चाहते।  मनुष्य  जीवन  में  ऐसे  अवसर ईश्वरदत्त होते हैं। प्रतापचन्द्र के जीवन में भी वह शुभ अवसर था,  जब  वह  संकीर्ण  गलियों  में होता हुआ गंगा किनारे आकर बैठा और शोक तथा लज्जा के अश्रु प्रवाहित  करने  लगा।  मनोविकार की प्रेरणाओं ने उसकी अधोगति में कोई कसर उठा न रखी थी परन्तु उसके लिए यह कठोर कृपालु  गुरु की ताड़ना प्रमाणित हुई। क्या यह अनुभवसिद्व नहीं है कि विष भी  समयानुसार  अमृत  का  काम करता है ?</p>
<p>जिस प्रकार वायु का झोंका सुलगती हुई अग्नि को दहका देता है, उसी प्रकार बहुधा  हृदय में दबे हुए उत्साह को भड़काने के लिए किसी बाह्य उद्योग की आवश्यकता होती है। अपने  दुखों  का अनुभव और दूसरों की आपत्ति का दृश्य बहुधा वह वैराग्य उत्पन्न करता है जो  सत्संग,  अध्ययन  और मन की प्रवृति से भी संभव नहीं। यद्यपि प्रतापचन्द्र के मन में उत्तम और निस्वार्थ जीवन  व्यतीत करने का विचार पूर्व ही से था, तथापि मनोविकार के धक्के ने वह काम एक ही क्षण में  पूरा  कर दिया, जिसके पूरा होने में वर्ष लगते। साधारण दशाओं में जाति-सेवा  उसके  जीवन  का  एक  गौण कार्य होता, परन्तु इस चेतावनी ने सेवा को उसके जीवन का प्रधान उद्देश्य बना  दिया।  सुवामा की हार्दिक अभिलाषा पूर्ण होने के सामान पैदा हो गये।  क्या  इन  घटनाओं  के  अन्तर्गत  कोई अज्ञात प्रेरक शाक्ति थी? कौन कह सकता है?</p>
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		<title>वरदान &#8211;  दु:ख-दशा</title>
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		<pubDate>Sun, 21 Aug 2011 15:16:06 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[किसी-किसी समय में भौतिक त्रय-तापों को किसी विशेष व्यक्ति या कुटुम्ब से प्रेम-सा  हो जाता है। कमला का शोक शान्त भी न हुआ था बाबू श्यामाचरण की  बारी  आयी।  शाखा-भेदन  से वृक्ष को मुरझाया हुआ न देखकर इस बार दुर्देव ने मूल ही काट डाला।  रामदीन  पाँडे  बडा  दंभी मनुष्य था। जब तक डिप्टी साहब मझगाँव में थे, दबका बैठा रहा, परन्तु ज्योंही वे नगर को  लौटे, उसी दिन से उसने उल्पात करना आरम्भ किया। सारा गाँव–का-गाँव उसका शत्रु था।  <a href="http://hindikosh.in/archives/257">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a title="प्रेमचंद" href="http://hindikosh.in/premchand"><strong>प्रेमचंद</strong></a></p>
<p><a title="वरदान" href="http://hindikosh.in/premchand/vardan"><strong>वरदान</strong></a></p>
<p>सौभाग्यवती स्त्री के लिए उसक पति संसार की सबसे प्यारी वस्तु होती है।  वह  उसी  के लिए जीती और मारती है। उसका हँसना-बोलना उसी के प्रसन्न करने के  लिए  और  उसका  बनाव-श्रृंगार उसी को लुभाने के लिए होता है। उसका सोहाग जीवन है और सोहाग का  उठ  जाना  उसके जीवन का अन्त है।</p>
<p>कमलाचरण की अकाल-मृत्यु वृजरानी के लिए मृत्यु से कम न थी। उसके जीवन  की  आशाएँ  और उमंगे सब मिट्टी मे मिल गयीं। क्या-क्या अभिलाषाएँ थीं  और  क्या  हो  गय?   प्रति-क्षण  मृत कमलाचरण का चित्र उसके नेत्रों में भ्रमण करता रहता। यदि थोड़ी देर के  लिए  उसकी  ऑखें  झपक जातीं, तो उसका स्वरुप साक्षात नेत्रों कें सम्मुख आ जाता।<br />
<span id="more-257"></span><br />
किसी-किसी समय में भौतिक त्रय-तापों को किसी विशेष व्यक्ति या कुटुम्ब से प्रेम-सा  हो जाता है। कमला का शोक शान्त भी न हुआ था बाबू श्यामाचरण की  बारी  आयी।  शाखा-भेदन  से वृक्ष को मुरझाया हुआ न देखकर इस बार दुर्देव ने मूल ही काट डाला।  रामदीन  पाँडे  बडा  दंभी मनुष्य था। जब तक डिप्टी साहब मझगाँव में थे, दबका बैठा रहा, परन्तु ज्योंही वे नगर को  लौटे, उसी दिन से उसने उल्पात करना आरम्भ किया। सारा गाँव–का-गाँव उसका शत्रु था। जिस दृष्टि  से मझगाँव वालों ने होली के दिन उसे देखा, वह दृष्टि उसके हृदय में काँटे की भाँति  खटक  रही  थी। जिस मण्डल में माझगाँव स्थित था, उसके थानेदार साहब एक बडे घाघ और कुशल रिश्वती थे।  सहस्रों की रकम पचा जायें, पर डकार तक न लें। अभियोग बनाने और प्रमाण गढ़ने में  ऐसे  अभ्यस्त  थे  कि बाट चलते मनुष्य को फाँस लें और वह फिर किसी के छुड़ाये न छूटे। अधिकार वर्ग  उसक  हथकण्डों  से विज्ञ था, पर उनकी चतुराई और कार्यदक्षता के आगे किसी का कुछ बस  न  चलता  था।  रामदीन थानेदार साहब से मिला और अपने हृद्रोग की औषधि माँगी। उसक एक  सप्ताह  पश्चात्  मझगाँव  में डाका पड़ गया। एक महाजन नगर से आ रहा था। रात को नम्बरदार के यहाँ ठहरा। डाकुओं  ने  उसे लौटकर घर न जाने दिया। प्रात:काल थानेदार साहब तहकीकात करने आये और  एक  ही  रस्सी  में सारे गाँव को बाँधकर ले गये।</p>
<p>दैवात् मुकदमा बाबू श्यामाचारण की इजलास में पेश हुआ। उन्हें पहले से  सारा  कच्चा-चिट्ठा विदित था और ये थानेदार साहब बहुत दिनों से उनकी आंखों पर चढ़े हुए थे। उन्होंने ऐसी  बाल  की खाल निकाली की थानेदार साहब की पोल खुल गयी। छ: मास तक अभियोग चला और धूम  से  चला। सरकारी वकीलों ने बड़े-बड़े उपाय किये परन्तु घर के भेदी से क्या छिप सकता था? फल यह  हुआ  कि डिप्टी साहब ने सब अभियुक्तों को बेदाग छोड़ दिया और उसी दिन सायंकाल  को  थानेदार  साहब मुअत्तल कर दिये गये।</p>
<p>जब डिप्टी साहब फैसला सुनाकर लौटे, एक हितचिन्तक कर्मचारी ने कहा-  हुजूर,  थानेदार साहब से सावधान रहियेगा। आज बहुत झल्लाया हुआ था। पहले भी दो-तीन  अफसरों  को  धोखा  दे चुका है। आप पर अवश्य वार करेगा। डिप्टी साहब ने सुना और मुस्कराकर उस  मुनष्य  को  धन्यवाद दिया; परन्तु अपनी रक्षा के लिए कोई विशेष यत्न न किया। उन्हें इसमें अपनी भीरुता जान  पड़ती थी। राधा अहीर बड़ा अनुरोध करता रहा कि मै। आपके संग रहूँगा, काशी भर भी बहुत  पीछे  पड़ा रहा ; परन्तु उन्होंने किसी को संग न रखा। पहिले ही की तरह अपना काम करते रहे।</p>
<p>जालिम खाँ बात का धनी था, वह जीवन से हाथ धोकर बाबू श्यामाचरण के पीछे पड़  गया। एक दिन वे सैर करके शिवपुर से कुछ रात गये लौट रहे थे पागलखाने के निकट कुछ फिटिन  का  घोड़ा बिदकां गाड़ी रुक गयी और पलभर में जालिम खाँ ने एक वृक्ष की आड़ से पिस्तौल चलायी। पड़ाके  का शब्द हुआ और बाबू श्यामाचरण के वक्षस्थल से गोली पार हो गयी।  पागलखाने  के  सिपाही  दौड़े। जालिम खाँ पकड़ लिय गया, साइस ने उसे भागने न दिया था।</p>
<p>इस दुर्घटनाओं ने उसके स्वभाव और व्यवहार में अकस्मात्र बड़ा भारी परिवर्तन  कर  दिया।बात-बात पर विरजन से चिढ़ जाती और कटूक्त्तियों से उसे जलाती। उसे यह भ्रम हो  गया  कि  ये सब आपात्तियाँ इसी बहू की लायी हई है। यही अभागिन जब से घर आयी, घर  का  सत्यानाश  हो गया। इसका पौरा बहुत निकृष्ट है। कई बार उसने खुलकर विरजन  से  कह  भी  दिया  कि-तुम्हारे चिकने रुप ने मुझे ठग लिया। मैं क्या जानती थी कि तुम्हारे चरण ऐसे अशुभ हैं  !  विरजन  ये  बातें सुनती और कलेजा थामकर रह जाती। जब दिन ही बुरे आ गये, तो भली बातें क्योंकर  सुनने  में  आयें। यह आठों पहर का ताप उसे दु:ख के आंसू भी न बहाने देता। आँसूं तब निकलते है। जब कोई हितैषी  हो और दुख को सुने। ताने और व्यंग्य की अग्नि से ऑंसू जल जाते हैं।</p>
<p>एक दिन विरजन का चित्त बैठे-बैठे घर में ऐसा घबराया कि वह तनिक देर के लिए  वाटिका में चली आयी। आह !  इस वाटिका में कैसे-कैसे आनन्द के दिन बीते थे !   इसका  एक-एक  पध  मरने वाले के असीम प्रेम का स्मारक था। कभी वे दिन भी थे कि इन फूलों और पत्तियों को देखकर  चित्त प्रफुल्लित होता था और सुरभित वायु चित्त को प्रमोदित कर देती थी। यही वह  स्थल  है,  जहाँ अनेक सन्ध्याऍं प्रेमालाप में व्यतीत हुई थीं। उस समय पुष्पों की कलियाँ अपने कोमल अधरों से  उसका स्वागत करती थीं। पर शोक! आज उनके मस्तक झुके हुए और अधर बन्द थे। क्या यह वही स्थान न  था जहाँ ‘अलबेली मालिन’ फूलों के हार गूंथती थी?  पर भोली मालिन को क्या मालूम  था  कि  इसी स्थान पर उसे अपने नेतरें से निकले हुए मोतियों को हाँर गूँथने पड़ेगें। इन्हीं विचारों में  विरजन  की दृष्टि उस कुंज की ओर उठ गयी जहाँ से एक बार कमलाचरण मुस्कराता हुआ निकला  था,  मानो  वह पत्तियों का हिलना और उसके वस्तरें की झलक देख रही है। उससे मुख पर उसे समय मन्द-मन्द मुस्कान-सी प्रकट होती थी, जैसे गंगा में डूबते हुर्श्र्य की पीली और मलिन किणें का प्रतिबिम्ब पड़ता  है। आचानक प्रेमवती ने आकर कर्णकटु शब्दों में कहा- अब आपका सैर करने का शौक हुआ है !</p>
<p>विरजन खड़ी हो गई और रोती हुई बोली-माता !  जिसे नारायण ने कुचला, उसे  आप  क्यों कुचलती हैं !</p>
<p>निदान प्रेमवती का चित्त वहाँ से ऐसा उचाट हुआ कि एक मास के भीतर सब  सामान  औने-पौने बेचकर मझगाँव चली गयी। वृजरानी को संग न लिया। उसका मुख देखने से  उसे  घृणा  हो  गयी थी। विरजन इस विस्तृत भवन में अकेली रह गयी। माधवी के अतिरिक्त अब उसका  कोई  हितैषी  न रहा। सुवामा को अपनी मुँहबोली बेटी की विपत्तियों का ऐसा हीशेक हुआ, जितना अपनी बेटी  का होता। कई दिन तक रोती रही और कई दिन बराबर उसे सझाने के लिए  आती  रही।  जब  विरजन अकेली रह गयी तो सुवमा ने चाहा हहक यह मेरे यहाँ उठ आये और सुख से रहे। स्वयं कई  बार  बुलाने गयी, पर विररजन किसी प्रकार जाने को राजी न हुई। वह सोचती थी कि  ससुर  को  संसार  से सिधारे भी तीन मास भी नहीं हुए, इतनी जल्दी यह घर सूना हो जायेगा, तो लोग कहेंगे कि  उनके मरते ही सास और बेहु लड़ मरीं। यहाँ तक कि उसके इस हठ से सुवामा का मन मोटा हो गया।</p>
<p>मझगाँव में प्रेमवती ने एक अंधेर मचा रखी थी। असामियों को कटु वजन कहती। कारिन्दा  के सिर पर जूती पटक दी। पटवारी को कोसा। राधा अहीर की गाय बलात् छीन ली। यहाँ कि  गाँव वाले घबरा गये ! उन्होंने बाबू राधाचरण से शिकायत की।  राधाचण  ने  यह  समाचार  सुना  तो विश्वास हो गया कि अवश्य इन दुर्घटनाओं ने अम्माँ की बुद्वि भ्रष्ट कर दी है। इस  समय   किसी प्रकार इनका मन बहलाना चाहिए। सेवती को लिखा कि तुम माताजी के पास चली जाओ  और  उनके संग कुछ दिन रहो। सेवती की गोद में उन  दिनों एक चाँद-सा बालक खेल रहा  था  और  प्राणनाथ दो मास की छुट्टी लेकर दरभंगा से आये थे। राजा साहब के प्राइवेट सेक्रटेरी हो गये थे। ऐसे  अवसर पर सेवती कैस आ सकती थी? तैयारियाँ करते-करते महीनों गुजर गये। कभी बच्चा बीमार  पड़  गया, कभी सास रुष्ट हो गयी कभी साइत न बनी। निदान छठे महीने उसे अवकाश  मिला।  वह  भी  बड़े विपत्तियों से।</p>
<p>परन्तु प्रेमवती पर उसक आने का कुछ भी प्रभाव न पड़ा। वह उसके गले  मिलकर  रोयी  भी नहीं, उसके बच्चे की ओर ऑंख उठाकर भी न देखा। उसक हृदय में अब ममता और प्रेम  नाम-मात्र  को भी न रह गयाञ। जैसे ईख से रस निकाल लेने पर केवल सीठी रह  जाती  है,  उसकी  प्रकार  जिस मनुष्य के हृदय से प्रेम निकल गया, वह अस्थि-चर्म का एक ढेर रह जाता है। देवी-देवता  का  नाम मुख पर आते ही उसके तेवर बदल जाते थे। मझागाँव में जन्माष्टमी हुई। लोगों ने  ठाकुरजी  का  व्रत रख और चन्दे से नाम कराने की तैयारियाँ करने लगे। परन्तु प्रेमवती ने ठीक जन्म के अवसर पर  अपने घर की मूर्ति खेत से फिकवा दी। एकादशी ब्रत टूटा, देवताओं की पूजा  छूटी।  वह  प्रेमवती  अब प्रेमवती ही न थी।</p>
<p>सेवती ने ज्यों-त्यों करके यहाँ दो महीने काटे। उसका चित्त  बहुत  घबराता।  कोई  सखी-सहेली भी न थी, जिसके संग बैठकर दिन काटती। विरजन ने तुलसा को अपनी सखी बना लिया  था। परन्तु सेवती का स्भव सरल न था। ऐसी स्त्रीयों से मेल-जोल करने में वह अपनी  मानहानि  समझती थी। तुलसा बेचारी कई बार आयी, परन्तु जब दख कि यह मन खोलकर नहीं मिलती  तो  आना-जाना छोड़ दिया।</p>
<p>तीन मास व्यतीत हो चुके थे। एक दिन सेवती दिन चढ़े तक सोती रही। प्राणनाथ  ने  रात को बहुत रुलाया था। जब नींद उचटी तो क्या देखती है कि प्रेमवती उसके बच्चे को  गोद  में  लिय चूम रही है। कभी आखें से लगाती है , कभी छाती से चिपटाती है। सामने  अंगीठी  पर  हलुवा  पक रहा है। बच्चा उसकी ओर उंगली से संकेत करके उछलता है कि कटोरे में जा बैठूँ और  गरम-गरम  हलुवा चखूँ। आज उसक मुखमण्डल कमल की भाँति खिला हुआ है। शायद उसकी तीव्र दृष्टि ने यह  जान  लिया है कि प्रेमवती के शुष्क हृदय में प्रेमे ने आज फिर से निवास किया है। सेवती को  विश्वास  न  हुआ। वह चारपाई पर पुलकित लोचनों से ताक रही थी मानों स्वप्न देख  रही  थी।  इतने  में  प्रेमवती प्यार से बोली- उठो बेटी ! उठो ! दिन बहुत चढ़ आया है।</p>
<p>सेवती के रोंगटे खड़े हो गओ और आंखें भर आयी। आज बहुत दिनों के पश्चात माता  के  मुख  से प्रेममय बचन सुने। झट उठ बैठी और माता के गले लिपट कर रोने लगी। प्रेमवती की खें  से  भी  आंसू की झड़ी लग गयीय, सूखा वृक्ष हरा हुआ। जब दोनों के ऑंसू थमे तो प्रेमवती बोली-सित्तो !   तुम्हें आज यह बातें अचरज प्रतीत होती है ; हाँ बेटी, अचरज ही न। मैं कैसे रोऊं, जब आंखों  में  आंसू  ही रहे?  प्यार कहाँ से लाऊं जब कलेजा सूखकर पत्थर हो गया? ये सब दिनों के फेर हैं। ऑसू  उनके  साथ गये और कमला के साथ। अज न जाने ये दो बूँद कहाँ से निकल आये?  बेटी !  मेरे सब  अपराध  क्षमा करना।</p>
<p>यह कहते-कहते उसकी ऑखें झपकने लगीं। सेवती घबरा गयी। माता हो बिस्तर पर लेटा  दिया और पख झलने लगी। उस दिन से प्रेमवती की यह दशा हो गयी कि जब देखों रो रही है।  बच्चे  को एक क्षण लिए भी पास से दूर नहीं करती। महरियों से बोलती तो मुख  से  फूल  झड़ते।  फिर  वही पहिले की सुशील प्रेमवती हो गयी। ऐसा प्रतीत होता था, मानो उसक हृदय पर से एक  पर्दा-सा उठ गया है ! जब कड़ाके का जाड़ा पड़ता है, तो प्राय: नदियाँ  बर्फ  से  ढँक  जाती  है।  उसमें बसनेवाले जलचर बर्फ मे पर्दे के पीछे छिप जाते हैं, नौकाऍं फँस  जाती  है  और  मंदगति,  रजतवर्ण प्राण-संजीवन जल-स्रोत का स्वरुप कुछ भी दिखायी नहीं देता है। यद्यपि बर्फ की चद्दर  की  ओट में वह मधुर निद्रा में अलसित पड़ा रहता था, तथापि जब गरमी का साम्राज्य होता है, तो  बर्फ पिघल जाती है और रजतवर्ण नदी अपनी बर्फ का चद्दर उठा लेती है, फिर मछलियाँ और जलजन्तु  आ बहते हैं, नौकाओं के पाल लहराने लगते हैं और तट पर मनुष्यों और पक्षियों का जमघट हो जाता है।</p>
<p>परन्तु प्रेमवती की यह दशा बहुत दिनों तक स्थिर न रही। यह  चेतनता  मानो  मृत्यु  का सन्देश थी। इस चित्तोद्विग्नता ने उसे अब तक जीवन-कारावास में रखा था, अन्था  प्रेमवती  जैसी कोमल-हृदय स्त्री विपत्तियों के ऐसे झोंके कदापि न सह सकती।</p>
<p>सेवती ने चारों ओर तार दिलवाये कि आकर माताजी को देख जाओ पर कहीं से कोई न  आया। प्राणनाथ को छुट्टी न मिली, विरजन बीमार थी, रहे राधाचरण।  वह  नैनीताल  वायु-परिवर्तन करने गये हुए थे। प्रेमवती को पुत्र ही को देखने की लालसा थी, पर जब उनका पत्र  आ  गया  कि इस समय मैं नहीं आ सकता, तो उसने एक लम्बी साँस लेकर ऑंखे मूँद ली, और  ऐसी  सोयी  कि  फिर उठना नसीब न हुआ !</p>
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		<title>वरदान &#8211; प्रतापचन्द्र और कमलाचरण</title>
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		<pubDate>Sun, 21 Aug 2011 15:12:58 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[प्रतापचन्द्र को प्रयाग कालेज में पढ़ते तीन साल हो चुके  थे।  इतने  काल  में  उसने  अपने सहपाठियों और गुरुजनों की दृष्टि में विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली थी। कालेज के जीवन का  कोई ऐसा अंग न था जहाँ उनकी प्रतिभा न प्रदर्शित हुई हो। प्रोफेसर  उस  पर  अभिमान  करते  और छात्रगण उसे अपना नेता समझते हैं। जिस प्रकार क्रीड़ा-क्षेत्र में उसका हस्तलाघव  प्रशंसनीय  था, उसी प्रकार व्याख्यान-भवन में उसकी योग्यता और सूक्ष्मदर्शिता प्रमाणित थी। कालेज  से  सम्बद्व एक मित्र-सभा स्थापित की गयी थी। नगर के साधारण सभ्य जन, कालेज के प्रोफेसर  और  छात्रगण  सब उसके सभासद थे। प्रताप इस सभा का उज्ज्वल चन्द्र था। यहां देशिक और सामाजिक विषयों  पर विचार हुआ करते थे।  <a href="http://hindikosh.in/archives/254">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a title="प्रेमचंद" href="http://hindikosh.in/premchand"><strong>प्रेमचंद</strong></a></p>
<p><a title="वरदान" href="http://hindikosh.in/premchand/vardan"><strong>वरदान</strong></a></p>
<p>प्रतापचन्द्र को प्रयाग कालेज में पढ़ते तीन साल हो चुके  थे।  इतने  काल  में  उसने  अपने सहपाठियों और गुरुजनों की दृष्टि में विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली थी। कालेज के जीवन का  कोई ऐसा अंग न था जहाँ उनकी प्रतिभा न प्रदर्शित हुई हो। प्रोफेसर  उस  पर  अभिमान  करते  और छात्रगण उसे अपना नेता समझते हैं। जिस प्रकार क्रीड़ा-क्षेत्र में उसका हस्तलाघव  प्रशंसनीय  था, उसी प्रकार व्याख्यान-भवन में उसकी योग्यता और सूक्ष्मदर्शिता प्रमाणित थी। कालेज  से  सम्बद्व एक मित्र-सभा स्थापित की गयी थी। नगर के साधारण सभ्य जन, कालेज के प्रोफेसर  और  छात्रगण  सब उसके सभासद थे। प्रताप इस सभा का उज्ज्वल चन्द्र था। यहां देशिक और सामाजिक विषयों  पर विचार हुआ करते थे। प्रताप की वक्तृताऍं ऐसी ओजस्विनी और तर्क-पूर्ण होती  थीं  की  प्रोफेसरों को भी उसके विचार और विषयान्वेषण पर आश्चर्य होता था। उसकी वक्तृता और उसके खेल दोनों  ही प्रभाव-पूर्ण होते थे। जिस समय वह अपने साधारण वस्त्र पहिने हुए प्लेटफार्म पर जाता, उस  समय सभास्थित लोगों की आँखे उसकी ओर एकटक देखने लगती और चित्त में उत्सुकता और  उत्साह  की  तरंगें उठने लगती। उसका वाक्चातुर्य उसक संकेत और मृदुल उच्चारण, उसके अंगों-पांग की  गति,  सभी  ऐसे प्रभाव-पूरित होते थे मानो शारदा स्वयं उसकी सहायता करती है।  जब  तक  वह  प्लेटफार्म  पर रहता सभासदों पर एक मोहिनी-सी छायी रहती। उसका एक-एक वाक्य हृदय में भिद जाता और  मुख से सहसा ‘वाह-वाह!’ के शब्द निकल जाते। इसी विचार से उसकी वक्तृताऍं  प्राय:  अन्त  में  हुआ करती थी क्योंकि बहुतधा श्रोतागण उसी की वाक्तीक्ष्णता का आस्वादन करने के  लिए  आया  करते थे। उनके शब्दों और उच्चारणों में स्वाभाविक प्रभाव था। साहित्य और इतिहास  उसक  अन्वेषण  और अध्ययन के विशेष थे। जातियों की उन्नति और अवनति तथा उसके कारण और  गति  पर  वह  प्राय: विचार किया करता था। इस समय उसके इस परिश्रम और उद्योग के प्ररेक  तथा  वर्द्वक  विशेषकर श्रोताओं के साधुवाद ही होते थे और उन्हीं को वह अपने कठिन परिश्रम का पुरस्कार  समझता  था। हाँ, उसके उत्साह की यह गति देखकर यह अनुमान किया जा सकता था कि वह होनहार बिरवा  आगे चलकर कैसे फूल-फूल लायेगा और कैसे रंग-रुप निकालेगा। अभी तक उसने क्षण भी के लिए  भी  इस  पर ध्यान नहीं दिया था कि मेरे अगामी जीवन का क्या स्वरुप होगा। कभी सोचता कि  प्रोफेसर  हो जाँऊगा और खूब पुस्तकें लिखूँगा। कभी वकील बनने की भावना करता। कभी सोचता, यदि  छात्रवृत्ति प्राप्त होगी तो सिविल सविर्स का उद्योग करुंगा। किसी एक ओर मन नहीं टिकता था।<br />
<span id="more-254"></span><br />
परन्तु प्रतापचन्द्र उन विद्याथियों में से न था, जिनका सारा उद्योग वक्तृता और  पुस्तकों ही तक परिमित रहता है। उसके संयम और योग्यता का एक छोटा भाग जनता के लाभार्थ  भी  व्यय होता था। उसने प्रकृति से उदार और दयालु हृदय पाया था और सर्वसाधरण से मिलन-जुलने और  काम करने की योग्यता उसे पिता से मिली थी।  इन्हीं  कार्यों  में  उसका  सदुत्साह  पूर्ण  रीति  से प्रमाणित होता था। बहुधा सन्ध्या समय वह कीटगंज और कटरा की दुर्गन्धपूर्ण  गलियों  में  घूमता दिखायी देता जहाँ विशेषकर नीची जाति के लोग बसते हैं। जिन लोगों की परछाई से  उच्चवर्ण  का हिन्दू भागता है, उनके साथ प्रताप टूटी खाट पर बैठ कर घंटों बातें करता और यही कारण था  कि इन मुहल्लों के निवासी उस पर प्राण देते थे। प्रेमाद  और  शारीरिक  सुख-प्रलोभ  ये  दो  अवगुण प्रतापचन्द्र में नाममात्र को भी न थे। कोई अनाथ मनुष्य हो  प्रताप  उसकी  सहायता  के  लिए तैयार था। कितनी रातें उसने झोपड़ों में कराहते हुए रोगियों के सिरहाने  खड़े  रहकर  काटी  थीं। इसी  अभिप्राय से उसने जनता का लाभार्थ एक सभा भी स्थापित कर रखी थी और  ढाई  वर्ष  के अल्प समय में ही इस सभा ने जनता की सेवा में इतनी सफलता प्राप्त की  थी  कि  प्रयागवासियों को उससे प्रेम हो गया था।</p>
<p>कमलाचरण जिस समय प्रयाग पहुँचा, प्रतापचन्द्र ने उसका बड़ा आदर किया। समय  ने  उसके चित्त के द्वेष की ज्वाला शांत कर दी थी। जिस समय वह विरजन की बीमारी का समाचार  पाकर बनारस पहुँचा था और उससे भेंट होते ही विरजन की दशा सुधर चली थी, उसी समय  प्रताप  चन्द्र को विश्वास हो गया था कि कमलाचरण ने उसके हृदय में वह स्थान नहीं  पाया  है  जो  मेरे  लिए सुरक्षित है। यह विचार द्वेषाग्नि को शान्त करने के लिए काफी था। इससे अतिरिक्त  उसे  प्राय: यह विचार भी उद्विगन किया करता था कि मैं ही सुशीला का प्राणघातक  हूँ।  मेरी  ही  कठोर वाणियों ने उस बेचारी का प्राणघात किया और उसी समय से जब कि सुशील ने मरते समय  रो-रोकर उससे अपने अपराधों की क्षमा माँगी थी, प्रताप ने मन में ठान लिया था। कि अवसर  मिलेगा  तो मैं इस पाप का प्रायश्चित अवश्य करुंगा। कमलाचरण का आदर-सत्कार  तथा  शिक्षा-सुधार  में  उसे किसी अंश में प्रायश्चित को पूर्ण करने का अपूर्व अवसर प्राप्त हुआ। वह उससे इस प्रकार  व्यवहार रखता, जैसे छोटा भाई के साथ अपने समय का कुछ भाग उसकी सहायता करने में व्यय करता और  ऐसी सुगमता से शिक्षक का कर्त्तवय पालन करता कि शिक्षा एक रोचक कथा का रुप धारण कर लेती।</p>
<p>परन्तु प्रतापचन्द्र के इन प्रयत्नों के होते हुए भी कमलाचरण का जी यहाँ  बहुत  घबराता। सारे छात्रवास में उसके स्वाभावनुकूल एक मनुष्य भी न था, जिससे वह अपने मन का दु:ख कहता।  वह प्रताप से निस्संकोच रहते हुए भी चित्त की बहुत-सी बातें न कहता  था।  जब  निर्जनता  से  जी अधिक घबराता तो विरजन को कोसने लगता कि मेरे सिर पर यह सब आपत्तियाँ उसी की लादी  हुई हैं। उसे मुझसे प्रेम नहीं। मुख और लेखनी का प्रेम भी कोई प्रेम है ? मैं चाहे उस पर प्राण ही  क्यों न वारुं, पर उसका प्रेम वाणी और लेखनी से बाहर न निकलेगा। ऐसी मूर्ति के  आगे,  जो  पसीजना जानती ही नहीं, सिर पटकने से क्या लाभ। इन विचारों ने यहाँ तक जोर पकड़ा कि  उसने  विरजन को पत्र लिखना भी त्याग दिया। वह बेचारी अपने पत्रों में कलेजा निकलाकर रख देती, पर  कमला उत्तर तक न देता। यदि देता भी तो  रुखा और हृदयविदारक। इस समय विरजन की  एक-एक  बात, उसकी एक-एक चाल उसके प्रेम की शिथिलता का परिचय देती हुई प्रतीत  होती  थी।  हाँ,  यदि विस्मरण हो गयी थी तो विरजन की स्नेहमयी बातें, वे मतवाली ऑंखे जो वियोग  के  समय  डबडबा गयी थीं और कोमल हाथ जिन्होंने उससे विनती की थी कि पत्र बराबर भेजते रहना।  यदि  वे  उसे स्मरण हो आते, तो सम्भव था कि उसे  कुछ  संतोष  होता।  परन्तु  ऐसे  अवसरों  पर  मनुष्य  की स्मरणशक्ति धोखा दे दिया करती है।</p>
<p>निदान, कमलाचरण ने अपने मन-बहलाव का एक ढंग सोच ही निकाला। जिस समय से उसे  कुछ ज्ञान हुआ, तभी से उसे सौन्दर्य-वाटिका में भ्रमण करने की चाट पड़ी थी, सौन्दर्योपासना  उसका स्वभाव हो गया था।  वह उसके लिए ऐसी ही अनिवार्य थी, जैसे शरीर  रक्षा  के  लिए  भोजन। बोर्डिंग हाउस से मिली हुई एक सेठ की वाटिका थी और उसकी देखभाल  के लिए माली नौकर  था। उस माली के सरयूदेवी नाम की एक कुँवारी लड़की थी। यद्यपि वह परम  सुन्दरी  न  थी,  तथापि कमला सौन्दर्य का इतना इच्छुक न था, जितना किसी विनोद की सामग्री का। कोई  भी  स्त्री, जिसके शरीर पर यौवन की झलक हो, उसका मन बहलाने के लिए समुचित थी। कमला इस  लड़की  पर डोरे डालने लगा। सन्ध्या समय निरन्तर वाटिका की पटरियों पर टहलता हुआ दिखायी  देता।  और लड़के तो मैदान में कसरत करते, पर कमलाचरण वाटिका में आकर ताक-झाँक किया  करता।  धीरे-धीरे सरयूदेवी से परिचय हो गया। वह उससे गजरे मोल लेता और चौगुना मूल्य देता। माली  को  त्योहार के समय सबसे अधिक त्योहरी कमलाचरण ही से मिलती। यहाँ तक  कि  सरयूदेवी  उसके  प्रीति-रुपी जाल का आखेट हो गयी और एक-दो बार अन्धकार के पर्दे में परस्पर संभोग भी हो गया।</p>
<p>एक दिन सन्ध्या का समय था, सब विद्यार्थी सैर को गये हुए थे, कमला अकेला वाटिका  में टहलता था और रह-रहकर माली के झोपड़ों की ओर झाँकता था। अचानक झोपड़े में से सरयूदेवी ने  उसे संकेत द्वारा बुलाया। कमला बड़ी शीघ्रता से भीतर घुस गया। आज सरयूदेवी  ने  मलमल  की  साड़ी पहनी थी, जो कमलाबाबू का उपहार थी। सिर में सुगंधित तेल डाला था, जो कमला  बाबू  बनारस से लाये थे और एक छींट का सलूका पहने हुई थी, जो  बाबू साहब ने उसके लिए  बनवा  दिया  था। आज वह अपनी दृष्टि में परम  सुन्दरी प्रतीत होती थी, नहीं तो कमला जैसा धनी मनुष्य  उस  पर क्यों पाण देता ? कमला खटोले पर बैठा हुआ सरयूदेवी के हाव-भाव को मतवाली दृष्टि से  देख  रहा था। उसे उस समय सरयूदेवी वृजरानी से किसी प्रकार कम सुन्दरी नहीं दीख  पड़ती  थी।  वर्ण  में तनिक सा अन्तर था, पर यह ऐसा कोई बड़ा अंतर नहीं। उसे सरयूदेवी का प्रेम सच्चा और उत्साहपूर्ण जान पड़ता था, क्योंकि वह जब  कभी बनारस जाने की चर्चा करता, तो सरयूदेवी फूट-फूटकर रोने लगती  और  कहती  कि  मुझे  भी  लेते चलना। मैं तुम्हारा संग न छोडूँगी। कहाँ यह प्रेम की तीव्रता व  उत्साह  का  बाहुल्य  और  कहाँ विरजन की उदासीन सेवा और निर्दयतापूर्ण अभ्यर्थना !</p>
<p>कमला अभी भलीभाँति ऑंखों को सेंकने भी न पाया था कि अकस्मात्  माली  ने  आकर  द्वार खटखटाया। अब काटो तो शरीर में रुधिर नहीं। चेहरे का रंग उड़ गया।  सरयूदेवी  से  गिड़गिड़ाकर बोला- मैं कहाँ जाऊं?  सरयूदेवी का ज्ञान आप ही शून्य हो गया, घबराहट में मुख से  शब्द  तक  न निकला। इतने में माली ने फिर किवाड़ खटखटाया। बेचारी सरयूदेवी  विवश  थी।  उसने  डरते-डरते किवाड़ खोल दिया। कमलाचरण एक कोनें में श्वास रोककर खड़ा हो गया।</p>
<p>जिस प्रकार बलिदान का बकरा कटार के तले तड़पता है उसी प्रकार कोने में खड़े हुए  कमला का कलेजा धज्ञड़क रहा था। वह अपने जीवन से निराश था और ईश्वर को सच्चे हृदय  से  स्मरण  कर रहा था और कह रहा था कि इस बार इस आपत्ति से मुक्त हो जाऊंगा तो फिर कभी ऐसा  काम  न करुंगा।</p>
<p>इतने में माली की दृष्टि उस पर  पड़ी, पहिले तो घबराया, फिर निकट आकर  बोला-  यह कौन खड़ा है?  यह कौन है ?</p>
<p>इतना सुनना था कि कमलाचरण झपटकर बाहर निकला और फाटक की ओर जी छोड़कर  भागा। माली एक डंडा हाथ में लिये ‘लेना-लेना, भागने न पाये?’ कहता हुआ  पीछे-पीछे  दौड़ा।  यह  वह कमला है जो माली को पुरस्कार व पारितोषिक दिया करता था, जिससे माली  सरकार  और  हुजूर कहकर बातें करता था। वही कमला आज उसी माली सम्मुख इस प्रकार जान लेकर  भागा  जाता  है। पाप अग्नि का वह कुण्ड है जो आदर और मान, साहस और धैर्य को क्षण-भर  में  जलाकर  भस्म  कर देता है।</p>
<p>कमलाचरण वृक्षों और लताओं की ओट में दौड़ता हुआ फाटक से बाहर निकला। सड़क  पर  ताँगा जा रहा था, जो बैठा और हाँफते-हाँफते अशक्त होकर गाड़ी के पटरे पर गिर पड़ा।  यद्यपि  माली ने फाटक भी पीछा न किया था, तथापि कमला प्रत्येक  आने-जाने  वाले  पर  चौंक-चौंककर  दृष्टि डालता थ, मानों सारा संसार शत्रु हो गया है। दुर्भाग्य ने एक  और  गुल  खिलाया।  स्टेशन  पर पहुँचते ही घबराहट का मारा गाड़ी में जाकर बैठ गय, परन्तु उसे टिकट लेने की सुधि  ही  न  रही और न उसे यह खबर थी कि मैं किधर जा रहा हूँ। वह इस समय इस नगर  से  भागना  चाहता  था, चाहे कहीं हो। कुछ दूर चला था कि अंग्रेज अफसर लालटेन लिये आता दिखाई दिया।  उसके  संग  एक सिपाही भी था। वह यात्रियों का टिकट देखता चला आता था;  परन्तु कमला ने  जान  कि  कोई पुलिस अफसर है। भय के मारे हाथ-पाँव सनसनाने लगे, कलेजा धड़कने लगा। जब अंग्रेज  दसूरी  गड़ियों में जाँच करता रहा, तब तक तो वह कलेजा कड़ा किये प्रेकार बैठा रहा, परन्तु  ज्यों  उसके  डिब्बेका फाटक खुला कमला के हाथ-पाँव फूल गये, नेत्रों के सामने अंधेरा छा गया।  उतावलेपन  से  दूसरी ओर का किवाड़ खोलकर चलती हुई रेलगाड़ी पर से नीचे कूद पडा। सिपाही और रेलवाले साहब ने  उसे इस प्रकार कूदते देखा तो समझा कि कोई अभ्यस्त  डाकू  है,  मारे  हर्ष  के  फूले  न  समाये  कि पारितोषिक अलग मिलेगा और वेतनोन्नति अलग होगी, झट लाल  बत्ती  दिखायी।  तनिक  देर  में गाड़ी रुक गयी। अब गार्ड, सिपाही और टिकट वाले साहब कुछ अन्य मनुष्यों के सहित  गाड़ी  उतर गयी। अब गार्ड, सिपाही और टिकट वाले साहब कुछ अन्य मुनष्यों के सहित गाड़ी से उत्तर पड़े  और लालटेन ले-लेकर इधर-उधर देखने लगे। किसी ने कहा-अब उसकी धून भी न मिलेगी, पक्का  डकैत  था। कोई बोला- इन लोगों को कालीजी का इष्ट रहता है, जो कुछ न कर  दिखायें,  थोड़ा  हैं  परन्तु गार्ड आगे ही बढ़ता गया। वेतन वुद्वि की आशा उसे आगे ही लिये जाती थी। यहाँ तक कि  वह  उस स्थान पर जा पहुँचा, जहाँ कमेला गाड़ी से कूदा था। इतने में सिपाही ने खड्डे की ओर  सकंकेत  करके कहा- देखो, वह श्वेत रंग की क्या वस्तु है ?  मुझे तो कोई मनुष्य-सा प्रतीत होता है  और  लोगों ने देखा और विश्वास हो गया कि अवश्य ही दुष्ट डाकू यहाँ छिपा हुआ है,  चलकर  उसको  घेर  लो ताकि कहीं निकलने न पावे, तनिक सावधान रहना डाकू प्राणपर खेल  जाते  हैं।  गार्ड  साहब  ने पिस्तौल सँभाली, मियाँ सिपाही ने लाठी तानी। कई स्त्रीयों ने जूते उतार कर हाथ  में  ले  लिये कि कहीं आक्रमण कर बैठा तो भागने में सुभीता होगा। दो मनुष्यों ने ढेले उठा लिये कि दूर  ही  से लक्ष्य करेंगे। डाकू के निकट कौन जाय, किसे जी भारी है?  परन्तु जब लोगों ने समीप  जाकर  देखा तो न डाकू था, न डाकू भाई; किन्तु एक सभ्य-स्वरुप, सुन्दर वर्ण, छरहरे शरीर का नवयुवक  पृथ्वी पर औंधे मुख पड़ा  है और उसके नाक और कान से धीरे-धीरे रुधिर बह रहा है।</p>
<p>कमला ने इधर साँस तोड़ी और विरजन एक भयानक स्वप्न  देखकर  चौंक  पड़ी।  सरयूदेवी  ने विरजन का सोहाग लूट लिया।</p>
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		<title>वरदान &#8211; कमला के नाम विरजन के पत्र</title>
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		<pubDate>Sun, 21 Aug 2011 15:11:15 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[
कैसी मूर्खता है! कैसी मिथ्या भक्ति है! ये भावनाऍं हृदय पर वज्रलीक हो गयी  है।  बालक बीमार हुआ कि भूत की पूजा होने लगी। खेत-खलिहान में भूत  का  भोग  जहाँ  देखिये,  भूत-ही-भूत दीखते हैं। यहॉँ न देवी है, न देवता। भूतों का ही साम्राज्य हैं। यमराज यहॉँ चरण नहीं रखते,  भूत ही जीव-हरण करते हैं। इन भावों का किस प्रकार सुधार हो ?  किमधिकम <a href="http://hindikosh.in/archives/252">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a title="प्रेमचंद" href="http://hindikosh.in/premchand"><strong>प्रेमचंद</strong></a></p>
<p><a title="वरदान" href="http://hindikosh.in/premchand/vardan"><strong>वरदान</strong></a></p>
<p>मझगाँव<br />
‘प्रियतम,</p>
<p>प्रेम पत्र आया। सिर पर चढ़ाकर नेत्रों से लगाया। ऐसे पत्र  तुम  न  लख  करो  !  हृदय विदीर्ण हो जाता है। मैं लिखूं तो असंगत नहीं। यहॉँ चित्त अति व्याकुल हो रहा है।  क्या  सुनती थी और क्या देखती हैं ? टूटे-फूटे फूस के झोंपड़े, मिट्टी की दीवारें, घरों के सामने कूड़े-करकट के बड़े-बड़े ढेर, कीचड़ में लिपटी हुई भैंसे, दुर्बल गायें, ये सब दृश्य देखकर जी चाहता  है  कि  कहीं  चली जाऊं। मनुष्यों को देखों, तो उनकी सोचनीय दशा है। हड्डियॉँ निकली  हुई  है।  वे  विपत्ति  की मूर्तियॉँ और दरिद्रता के जीवित्र चित्र हैं। किसी के शरीर पर एक बेफटा वस्त्र नहीं है  और  कैसे भाग्यहीन कि रात-दिन पसीना बहाने पर भी कभी भरपेट रोटियॉँ नहीं  मिलतीं।  हमारे  घर  के पिछवाड़े एक गड्ढा है। माधवी खेलती थी। पॉँव फिसला तो पानी में गिर पड़ी।  यहॉँ  किम्वदन्ती है कि गड्ढे में चुडैल नहाने आया करती है और वे अकारण यह चलनेवालों से छेड़-छाड़ किया  करती  है। इसी प्रकार द्वार पर एक पीपल का पेड़ है।  वह भूतों का आवास है। गड्ढे का तो  भय  नहीं  है, परन्तु इस पीपल का वास सारे-सारे गॉँव के हृदय पर ऐसा छाया हुआ है। कि सूर्यास्त ही से  मार्ग बन्द हो जाता है। बालक और स्त्रीयाँ तो उधर पैर ही नहीं रखते! हॉँ, अकेले-दुकेले पुरुष  कभी-कभी चले जाते हैं, पर पे भी घबराये हुए। ये दो स्थान मानो उस  निकृष्ट  जीवों  के  केन्द्र  हैं।  इनके अतिरिक्त सैकड़ों भूत-चुडैल भिन्न-भिन्न स्थानों के निवासी पाये जाते हैं। इन लोगों को  चुड़ैलें  दीख पड़ती हैं। लोगों ने इनके स्वभाव पहचान किये है।  किसी भूत के विषय में कहा  जाता  है  कि  वह सिर पर चढ़ता है तो महीनों नहीं उतरता और कोई दो-एक पूजा लेकर अलग  हो  जाता  है।  गाँव वालों में इन विषयों पर इस प्रकार वार्तालाप होता है, मानों ये प्रत्यक्ष घटनाँ  है।  यहाँ  तक सुना गया हैं कि चुड़ैल भोजन-पानी मॉँगने भी आया करती हैं। उनकी साड़ियॉँ प्राय:  बगुले  के  पंख की भाँति उज्ज्वल होती हैं और वे बातें कुछ-कुछ नाक से करती है। हॉँ,  गहनों  को  प्रचार  उनकी जाति में कम है। उन्ही स्त्रीयों पर उनके आक्रमणका भय रहता है, जो बनाव  श्रृंगार  किये  रंगीन वस्त्र पहिने, अकेली उनकी दृष्टि मे पड़ जायें। फूलों की बास उनको बहुत भाती है। सम्भव नहीं  कि कोई स्त्री या बालक रात को अपने पास फूल रखकर सोये।<br />
<span id="more-252"></span><br />
भूतों के मान और प्रतिष्ठा का अनुमान बड़ी चतुराई से किया गया है।  जोगी  बाबा  आधीरात को काली कमरिया ओढ़े, खड़ाँऊ पर सवार, गॉँव के चारों आर  भ्रमण  करते  हैं  और  भूले-भटके पथिकों को मार्ग बताते है। साल-भर में एक बार उनकी पूजा होती हैं। वह अब भूतों में  नहीं  वरन् देवताओं में गिने जाते है। वह किसी भी आपत्ति को यथाशक्ति गॉँव के भीतर  पग  नहीं  रखने  देते। इनके विरुद्व धोबी बाबा से गॉँव-भर थर्राता है। जिस वुक्ष पर उसका वास है, उधर से यदि  कोई दीपक जलने के पश्चात्  निकल जाए, तो उसके प्राणों की कुशलता नहीं। उन्हें  भगाने  के  लिए  दो बोतल मदिरा काफी है। उनका पुजारी मंगल के दिन उस वृक्षतले गाँजा और चरस रख आता है।  लाला साहब भी भूत बन बैठे हैं। यह महाशय मटवारी थे। उन्हं कई पंडित असमियों  ने  मार  डाला  था। उनकी पकड़ ऐसी गहरी है कि प्राण लिये बिना नहीं छोड़ती। कोई  पटवारी  यहाँ  एक  वर्ष  से अधिक नहीं जीता। गॉँव से थोड़ी दूर पर एक पेड़ है। उस पर मौलवी साहब निवास  करते  है।  वह बेचारे किसी को नहीं छेड़ते। हॉँ, वृहस्पति के दिन पूजा न पहुँचायी जाए, तो बच्चों को छेड़ते हैं।</p>
<p>कैसी मूर्खता है! कैसी मिथ्या भक्ति है! ये भावनाऍं हृदय पर वज्रलीक हो गयी  है।  बालक बीमार हुआ कि भूत की पूजा होने लगी। खेत-खलिहान में भूत  का  भोग  जहाँ  देखिये,  भूत-ही-भूत दीखते हैं। यहॉँ न देवी है, न देवता। भूतों का ही साम्राज्य हैं। यमराज यहॉँ चरण नहीं रखते,  भूत ही जीव-हरण करते हैं। इन भावों का किस प्रकार सुधार हो ?  किमधिकम</p>
<p>तुम्हारी<br />
विरजन</p>
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		<title>वरदान &#8211; स्नेह पर कर्त्तव्य की विजय</title>
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		<pubDate>Sun, 21 Aug 2011 15:07:30 +0000</pubDate>
		<dc:creator>&#2360;&#2306;&#2332;&#2351;</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रेमचंद]]></category>
		<category><![CDATA[premchand]]></category>
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		<description><![CDATA[    रोगी जब तक बीमार रहता है उसे सुध नहीं रहती कि कौन मेरी औषधि करता है, कौन  मुझे देखने के लिए आता है। वह अपने ही कष्ट में इतना ग्रस्त रहता है कि किसी दूसरे के बात का  ध्यान ही उसके हृदय मं उत्पन्न नहीं होता; पर जब वह आरोग्य हो  जाता  है,  तब  उसे  अपनी  शुश्रषा करनेवालों का ध्यान और उनके उद्योग तथा परिश्रम का अनुमान होने लगता है  और  उसके  हृदय  में उनका प्रेम तथा आदर बढ़ जाता है। ठीक यही दशा वृजरानी की थी। जब तक वह स्वयं अपने  कष्ट  में मग्न थी, कमलाचरण की व्याकुलता और कष्टों का अनुभव न कर सकती  थी। <a href="http://hindikosh.in/archives/249">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a title="प्रेमचंद" href="http://hindikosh.in/premchand"><strong>प्रेमचंद</strong></a></p>
<p><a title="वरदान" href="http://hindikosh.in/premchand/vardan"><strong>वरदान</strong></a></p>
<p>रोगी जब तक बीमार रहता है उसे सुध नहीं रहती कि कौन मेरी औषधि करता है, कौन  मुझे देखने के लिए आता है। वह अपने ही कष्ट में इतना ग्रस्त रहता है कि किसी दूसरे के बात का  ध्यान ही उसके हृदय मं उत्पन्न नहीं होता; पर जब वह आरोग्य हो  जाता  है,  तब  उसे  अपनी  शुश्रषा करनेवालों का ध्यान और उनके उद्योग तथा परिश्रम का अनुमान होने लगता है  और  उसके  हृदय  में उनका प्रेम तथा आदर बढ़ जाता है। ठीक यही दशा वृजरानी की थी। जब तक वह स्वयं अपने  कष्ट  में मग्न थी, कमलाचरण की व्याकुलता और कष्टों का अनुभव न कर सकती  थी।  निस्सन्देह  वह  उसकी खातिरदारी में कोई अंश शेष न रखती थी, परन्तु यह व्यवहार-पालन के विचार से  होती  थी,  न कि सच्चे प्रेम से। परन्तु जब उसके हृदय से वह व्यथा मिट गयी तो  उसे  कमला  का  परिश्रम  और उद्योग स्मरण हुआ, और यह चिंता हुई कि इस अपार उपकार का प्रति-उत्तर क्या दूँ ?  मेरा  धर्म था सेवा-सत्कार से उन्हें सुख देती, पर सुख देना कैसा उलटे उनके प्राण ही की गाहक हुई हूं! वे  तो ऐसे सच्चे दिल से मेरा प्रेम करें और मैं अपना कर्त्तव्य ही न पालन कर सकूँ ! ईश्वर  को  क्या  मुँह दिखाँऊगी ? सच्चे प्रेम  का कमल बहुधा कृपा के भाव से खिल जाया करता है।  जहाँ  रुप  यौवन, सम्पत्ति और प्रभुता तथा स्वाभाविक सौजन्य प्रेम के बीच  बोने  में  अकृतकार्य  रहते  हैं,  वहॉँ, प्राय: उपकार का जादू चल जाता है। कोई हृदय ऐसा वज्र और कठोर नहीं हो  सकता,  जो  सत्य सेवा से द्रवीभूत न हो जाय।<br />
<span id="more-249"></span><br />
कमला और वृजरानी में दिनोंदिन प्रीति बढ़ने लगी। एक प्रेम का दास था, दूसरी  कर्त्तव्य की दासी। सम्भव न था कि वृजरानी के मुख से कोई बात निकले और कमलाचरण उसको पूरा  न   करे। अब उसकी तत्परता और योग्यता उन्हीं प्रयत्नों में व्यय होती थीह। पढ़ना केवल  माता-पिता  को धोखा देना था। वह सदा रुख देख करता और इस आशा पर कि यह काम उसकी  प्रसन्न्त  का  कारण होगा, सब कुछ करने पर कटिबद्व रहता। एक दिन उसने माधवी को फुलवाड़ी से फूल चुनते देखा।  यह छोटा-सा उद्यान घर के पीछे था। पर कुटुम्ब के किसी व्यक्ति को उसे प्रेम न था,  अतएव  बारहों मास उस पर उदासी छायी रहती थी। वृजरानी को फूलों से हार्दिक प्रेम था।  फुलवाड़ी  की  यह दुर्गति देखी तो माधवी से कहा कि कभी-कभी इसमं पानी दे दिया कर।  धीरे-धीरे  वाटिका  की दशा कुछ सुधर चली और पौधों में फूल लगने लगे। कमलाचरण के लिए  इशारा  बहुत  था।  तन-मन  से वाटिका को सुसज्जित करने पर उतारु हो गया। दो चतुर माली नौकर रख लिये। विविध प्रकार  के सुन्दर-सुन्दर पुष्प और पौधे लगाये जाने लगे। भॉँति-भॉँतिकी घासें और  पत्तियॉँ  गमलों  में  सजायी जाने लगी, क्यारियॉँ और रविशे ठीक की जाने लगीं। ठौर-ठौर पर लताऍं चढ़ायी गयीं।  कमलाचरण सारे दिन हाथ में पुस्तक लिये फुलवाड़ी में टहलता रहता था और मालियों को वाटिका  की  सजावट और बनावट की ताकीद किया करता था, केवल इसीलिए कि विरजन प्रसन्न होगी।  ऐसे  स्नेह-भक्त का जादू किस पर न चल जायगा। एक दिन कमला ने  कहा-आओ,  तुम्हें  वाटिका  की  सैर  कराँऊ। वृजरानी उसके साथ चली।</p>
<p>चॉँद निकल आया था।  उसके उज्ज्वल प्रकाश में पुष्प और पत्ते परम  शोभायमान  थे।  मन्द-मन्द वायु चल रहा था। मोतियों और बेले की सुगन्धि मस्तिषक को सुरभित कर रही थीं।  ऐसे  समय में विरजन एक रेशमी साड़ी और एक सुन्दर स्लीपर पहिने रविशों में टहलती दीख  पड़ी।  उसके  बदन का विकास फूलों को लज्जित करता था, जान पड़ता था कि फूलों की देवी है। कमलाचरण  बोला-आज परिश्रम सफल हो गया।</p>
<p>जैसे कुमकुमे में गुलाब भरा होता है, उसी प्रकार वृजरानी के नयनों में  प्रेम  रस  भरा  हुआ था। वह मुसकायी, परन्तु कुछ न बोली।</p>
<p>कमला-मुझ जैसा भाग्यवान मुनष्य संसार में न होगा।</p>
<p>विरजन-क्या मुझसे भी अधिक?</p>
<p>कमला मतवाला हो रहा था। विरजन को प्यार से गले लगा दिया।</p>
<p>कुछ दिनों तक प्रतिदिन का यही नियम रहा। इसी बीच में  मनोरंजन  की  नयी  सामग्री उपस्थित हो गयी। राधाचरण ने चित्रों का एक सुन्दर अलबम विरजन के पास भेजा। इसमं कई  चित्र चंद्रा के भी थे।  कहीं वह बैठी श्यामा को पढ़ा रही है कहीं बैठी पत्र लिख रही है।  उसका  एक चित्र पुरुष वेष में था। राधाचरण फोटोग्राफी की कला में कुशल थे। विरजन  को  यह  अलबम  बहुत भाया। फिर क्या था ? फिर क्या था?  कमला को धुन लगी कि मैं भी चित्र खीचूँ। भाई  के  पास पत्र लिख भेजा कि केमरा और अन्य आवश्यक सामान मेरे पास  भेज  दीजिये  और  अभ्यास  आरंभ  कर दिया। घर से चलते कि स्कूल जा रहा हूँ पर बीच ही में एक पारसी फोटोग्राफर की दूकान  पर  आ  बैठते। तीन-चार मास के परिश्रम और उद्योग से इस कला में प्रवीण हो गये। पर अभी घर में  किसी को यह बात मालूम न थी। कई बार विरजन ने पूछा भी; आजकल दिनभर कहाँ रहते  हो।  छुट्टी  के दिन भी नहीं दिख पड़ते। पर कमलाचरण ने हूँ-हां करके टाल दिया।</p>
<p>एक दिन कमलाचरण कहीं बाहर गये हुए थे। विरजन के जी में आया कि लाओ प्रतापचन्द्र  को एक पत्र लिख डालूँ;  पर बक्सखेला तो चिट्ठी का कागज न था माधवी से  कहा  कि  जाकर  अपने भैया के डेस्क में से कागज निकाल ला। माधवी दौड़ी हुई गयी तो उसे डेस्क पर  चित्रों  का  अलबम खुला हुआ मिला। उसने आलबम उठा लिया और भीतर लाकर विरजन से कहा-बहिन! दखों,  यह  चित्र मिला।</p>
<p>विरजन ने उसे चाव से हाथ में ले लिया और पहिला ही पन्ना उलटा था कि अचम्भा-सा  हो गया। वह उसी का चित्र था। वह अपने पलंग पर चाउर ओढ़े निद्रा में पड़ी हुई  थी,  बाल  ललाट पर बिखरे हुए थे, अधरों पर एक मोहनी मुस्कान की झलक थी मानों  कोई  मन-भावना  स्वप्न  देख रही है। चित्र के नीचे लख हुआ था- ‘प्रेम-स्वप्न’। विरजन चकित थी,  मेरा  चित्र  उन्होंने  कैसे खिचवाया और किससे खिचवाया। क्या किसी फोटोग्राफर को भीतर लाये होंगे  ?   नहीं  ऐसा  वे क्या करेंगे। क्या आश्चय्र है, स्वयं ही खींच लिया हो। इधर महीनों से बहुत परिश्रम भी  तो  करते हैं। यदि स्वयं ऐसा चित्र  खींचा है तो वस्तुत: प्रशंसनीय कार्य किया है। दूसरा पन्ना उलटा  तो उसमें भी अपना चित्र पाया। वह एक साड़ी पहने, आधे सिर पर आँचल डाले वाटिका  में  भ्रमण  कर रही थी। इस चित्र के नीचे लख हुआ था- ‘वाटिका-भ्रमण। तीसरा पन्ना उलटा तो वह भी  अपना ही चित्र था। वह वाटिका में पृथ्वी पर बैठी हार गूँथ रही थी। यह चित्र तीनों में  सबसे  सुन्दर था, क्योंकि   चित्रकार ने इसमें बड़ी कुशलता से प्राकृतिक रंग भरे थे। इस चित्र  के  नीचे  लिखा हुआ था- ‘अलबेली मालिन’। अब विरजन को ध्याना आया कि एक दिन जब मैं हार गूँथ रही थी  तो कमलाचरण नील के काँटे की झाड़ी मुस्कराते हुए निकले थे। अवश्य उसी दिन का  यह  चित्र  होगा। चौथा पन्ना उलटा तो एक परम मनोहर और सुहावना दृश्य दिखयी दिया। निर्मल जल  से  लहराता हुआ एक सरोवर था और उसके दोंनों तीरों पर जहाँ तक दृष्टि पहुँचती थी, गुलाबों की छटा  दिखयी देती थी। उनके कोमल पुष्प वायु के झोकां से लचके जात थे। एसका ज्ञात होता था,  मानों  प्रकृति ने हरे आकाश में लाल तारे टाँक दिये हैं। किसी अंग्रेजी चित्र का अनुकरण प्रतीत होता था।  अलबम के और पन्ने अभी कोरे थे।</p>
<p>विरजन ने अपने चित्रों को फिर देखा और साभिमान आनन्द से, जो प्रत्येक रमणी को  अपनी सुन्दरता पर होता है, अलबम को छिपा कर रख दिया। संध्या को कमलाचरण  ने  आकर  देखा,  तो अलबम का पता नहीं। हाथों  तो तोते उड़ गये। चित्र उसके कई मास के कठिन परिश्रम  के  फल  थे और उसे आशा थी कि यही अलबम उहार देकर विरजन के हृदय में और भी घर कर लूँगा।  बहुत  व्याकुल हुआ। भीतर जाकर विरजन से पूछा तो उसने साफ इन्कार किया। बेचारा घबराया हुआ  अपने  मित्रों के घर गया कि कोई उनमं से उठा ले गया हो। पह वहां भी फबतियों के अतिरिक्त और कुछ  हाथ  न लगा। निदान जब महाशय पूरे निराश हो गये तोशम को विरजन ने अलबम का पता  बतलाया।  इसी प्रकार दिवस सानन्द व्यतीत हो रहे थे। दोनों यही चाहते थे कि  प्रेम-क्षेत्र  मे  मैं  आगे  निकल जाँऊ! पर दोनों के प्रेम में अन्तर था। कमलाचरण प्रेमोन्माद में  अपने  को  भूल  गया।  पर  इसके विरुद्व विरजन का प्रेम कर्त्तव्य की नींव पर स्थित था। हाँ, यह आनन्दमय कर्त्तव्य था।</p>
<p>तीन वर्ष व्यतीत हो गये। वह उनके जीवन के तीन शुभ  वर्ष  थे।  चौथे  वर्ष  का  आरम्भ आपत्तियों का आरम्भ था। कितने ही प्राणियों को सांसार  की  सुख-सामग्रियॉँ  इस  परिमाण  से मिलती है कि उनके लिए दिन सदा होली और रात्रि सदा दिवाली रहती है। पर  कितने  ही  ऐसे हतभाग्य जीव हैं, जिनके आनन्द के दिन एक बार बिजली की भाँति चमककर सदा के  लिए  लुप्त  हो जाते है। वृजरानी उन्हीं अभागें में थी। वसन्त की ऋतु थी। सीरी-सीरी वायु चल रही  थी।  सरदी ऐसे कड़ाके की पड़ती थी कि कुओं का पानी जम जाता था। उस समय नगरों में प्लेग का प्रकोप  हुआ। सहस्रों मनुष्य उसकी भेंट होने लगे। एक दिन बहुत कड़ा ज्वर आया,  एक  गिल्टी  निकली  और  चल बसा। गिल्टी का निकलना मानो मृत्यु का संदश था। क्या वैद्य, क्या डाक्टर  किसी  की  कुछ  न चलती थी। सैकड़ो घरों के दीपक बुझ गये। सहस्रों बालक  अनाथ  और  सहस्रों  विधवा  हो  गयी। जिसको जिधर गली मिली भाग निकला। प्रत्येक मनुष्य को अपनी-अपनी पड़ी हुई थी।  कोई  किसी का सहायक और हितैषी न था। माता-पिता बच्चों को छोड़कर भागे। स्त्रीयों ने पुरषों  से  सम्बन्ध परित्याग किया। गलियों में, सड़को पर, घरों में जिधर देखिये मृतकों को ढेर  लगे  हुए  थे।  दुकाने बन्द हो गयी। द्वारों पर ताले बन्द हो  गया।  चुतुर्दिक  धूल  उड़ती  थी।  कठिनता  से  कोई जीवधारी चलता-फिरता दिखायी देता था और यदि कोई कार्यवश घर से  निकला  पड़ता  तो  ऐसे शीघ्रता से पॉव उठाता मानों मृत्यु का दूत उसका पीछा करता आ  रहा  है।  सारी  बस्ती  उजड़ गयी। यदि आबाद थे तो कब्रिस्तान या श्मशान। चोरों और डाकुओं की बन  आयी।  दिन–दोपहर तोल टूटते थे और सूर्य के प्रकाश में सेंधें पड़ती थीं। उस दारुण दु:ख का वर्णन नहीं हो सकता।</p>
<p>बाबू श्यामचरण परम दृढ़चित्त मनुष्य थे। गृह के चारों ओर महल्ले-के महल्ले शून्य  हो  गये  थे पर वे अभी तक अपने घर में निर्भय जमे हुए थे लेकिन जब उनका साहस मर  गया  तो  सारे  घर  में खलबली मच गयी। गॉँव में जाने की तैयारियॉँ होने लगी। मुंशीजी ने उस जिले के कुछ  गॉँव  मोल  ले लिये थे और मझगॉँव नामी ग्राम में एक अच्छा-सा घर भी बनवा रख था।   उनकी  इच्छा  थी  कि पेंशन पाने पर यहीं रहूँगा काशी छोड़कर आगरे में कौन मरने जाय! विरजन  ने  यह  सुना  तो  बहुत प्रसन्न हुई। ग्राम्य-जीवन के मनोहर दृश्य उसके नेत्रों में फिर रहे थे हरे-भरे वृक्ष और लहलहाते  हुए खेत हरिणों की क्रीडा और पक्षियों का कलरव। यह छटा देखने के लिए उसका चित्त  लालायित  हो रहा था। कमलाचरण शिकार खेलने के लिए अस्त्र-शस्त्र ठीक करने लगे। पर अचनाक मुन्शीजी  ने  उसे बुलाकर कहा कि तम प्रयाग जाने के लिए तैयार हो जाओ। प्रताप चन्द्र वहां   तुम्हारी  सहायता करेगा। गॉवों में व्यर्थ समय बिताने से क्या लाभ?  इतना सुनना था कि कमलाचरण की  नानी  मर गयी। प्रयाग जाने से इन्कार कर दिया। बहुत देर तक मुंशीजी उसे समझाते रहे पर वह जाने के  लिए राजी न हुआ। निदान उनके इन अंतिम शब्दों ने यह निपटारा कर दिया-तुम्हारे  भाग्य  में  विद्या लिखी ही नहीं है। मेरा मूर्खता है कि उससे लड़ता हूँ!</p>
<p>वृजरानी ने जब यह बात सुनी तो उसे बहुत दु:ख हुआ।  वृजरानी  यद्यपि  समझती  थी  कि कमला का ध्यान पढ़ने में नहीं लगता;  पर जब-तब यह अरुचि उसे बुरी न लगती थी,  बल्कि  कभी-कभी उसका जी चाहता कि आज कमला का स्कूल न जाना अच्छा  था।  उनकी  प्रेममय  वाणी  उसके कानों का बहुत प्यारी मालूम होती थी। जब उसे यह  ज्ञात  हुआ  कि  कमला  ने  प्रयाग  जाना अस्वीकार किया है और लालाजी बहुत समझ रहे हैं, तो उसे और भी दु:ख हुआ क्योंकि उसे  कुछ  दिनों अकेले रहना सहय था, कमला पिता को आज्ञज्ञेल्लघंन करे, यह सह्रय न था। माधवी  को  भेजा  कि अपने भैया को बुला ला। पर कमला ने जगह से हिलने की शपथ  खा  ली  थी।  सोचता  कि  भीतर जाँऊगा, तो वह अवश्य प्रयाग जाने के लिए कहेगी। वह क्या जाने कि यहाँ  हृदय  पर  क्या  बीत रही है। बातें तो ऐसी मीठी-मीठी करती है, पर जब कभी प्रेम-परीक्षा का समय आ जाता है  तो कर्त्तव्य और नीति की ओट में मुख छिपाने लगती है। सत्य है कि स्त्रीयों में प्रेम की गंध  ही  नहीं होती।</p>
<p>जब बहुत देर हो गयी और कमला कमरे से न निकला तब वृजरानी स्वयं आयी  और  बोली-क्या आज घर में आने की शपथ खा ली है। राह देखते-देखते ऑंखें पथरा गयीं।</p>
<p>कमला- भीतर जाते भय लगता है।</p>
<p>विरजन- अच्छा चलो मैं संग-संग चलती हूँ, अब तो नहीं डरोगे?</p>
<p>कमला- मुझे प्रयाग जाने की आज्ञा मिली है।</p>
<p>विरजन- मैं भी तुम्हारे सग चलूँगी!</p>
<p>यह कहकर विरजन ने कमलाचरण की ओर आंखे उठायीं उनमें अंगूर के दाने  लगे  हुए  थे।  कमला हार गया। इन मोहनी ऑखों में ऑंसू देखकर किसका हृदय था, कि अपने हठ पर दृढ़ रहता?  कमेला  ने उसे अपने कंठ से लगा लिया और कहा-मैं जानता था कि तुम जीत जाओगी। इसीलिए भीतर  न  जाता था। रात-भर प्रेम-वियोग की बातें होती रहीं! बार-बार ऑंखे परस्पर मिलती मानो वे फिर  कभी न मिलेगी! शोक किसे मालूम था कि यह अंतिम भेंट है। विरजन को फिर कमला से मिलना  नसीब  न हुआ।</p>
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		<title>वरदान &#8211; कर्तव्य और प्रेम का संघर्ष</title>
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		<pubDate>Sun, 21 Aug 2011 14:59:08 +0000</pubDate>
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				<category><![CDATA[प्रेमचंद]]></category>
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		<description><![CDATA[    जब तक विरजन ससुराल से न आयी थी तब तक  उसकी  दृष्टि  में  एक  हिन्दु-पतिव्रता  के कर्तव्य और आदर्श का कोई नियम स्थिर न हुआ था। घर में कभी पति-सम्बंधी चर्चा  भी  न  होती थी। उसने स्त्री-धर्म की पुस्तकें अवश्य पढ़ी थीं, परन्तु उनका कोई चिरस्थायी प्रभाव उस  पर  न हुआ था। कभी उसे यह ध्यान ही न आता था कि यह घर मेरा नहं है और मुझे बहुत शीघ्र ही यहां  से जाना पड़ेगा। <a href="http://hindikosh.in/archives/246">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a title="प्रेमचंद" href="http://hindikosh.in/premchand"><strong>प्रेमचंद</strong></a></p>
<p><a title="वरदान" href="http://hindikosh.in/premchand/vardan"><strong>वरदान</strong></a></p>
<p>जब तक विरजन ससुराल से न आयी थी तब तक  उसकी  दृष्टि  में  एक  हिन्दु-पतिव्रता  के कर्तव्य और आदर्श का कोई नियम स्थिर न हुआ था। घर में कभी पति-सम्बंधी चर्चा  भी  न  होती थी। उसने स्त्री-धर्म की पुस्तकें अवश्य पढ़ी थीं, परन्तु उनका कोई चिरस्थायी प्रभाव उस  पर  न हुआ था। कभी उसे यह ध्यान ही न आता था कि यह घर मेरा नहं है और मुझे बहुत शीघ्र ही यहां  से जाना पड़ेगा।<br />
<span id="more-246"></span><br />
परन्तु जब वह ससुराल में आयी और अपने प्राणनाथ पति को प्रतिक्षण आंखों  के  सामने  देखने लगी तो शनै: शनै: चित्-वृतियों में परिवर्तन होने लगा। ज्ञात  हुआकि  मैं  कौन  हूं,  मेरा  क्या कर्तव्य है, मेरा क्या र्धम और क्या उसके निर्वाह की रीति है? अगली बातें  स्वप्नवत्  जान  पड़ने लगीं। हां जिस समय स्मरण हो आता कि अपराध मुझसे ऐसा हुआ है, जिसकी कालिमा  को  मैं  मिटा नहीं सकती, तो स्वंय लज्जा से मस्तक झुका लेती और अपने को  उसे आश्चर्य होता कि  मुझे  लल्लू  के सम्मुख जाने का साहस कैसे हुआ! कदाचित् इस घटना को वह स्वप्न समझने की चेष्टा करती, तब  लल्लू का सौजन्यपूर्ण चित्र उसे सामने आ जाता और वह हृदय से  उसे  आर्शीवाद  देती,  परन्तु  आज  जब प्रतापचंद्र की क्षुद्र-हृदयता से उसे यह विचार करने का अवसर मिला कि लल्लू उस घटना को  अभी भुला नहीं है, उसकी दृष्टि में अब मेरी प्रतिष्टा नहीं रही, यहां तककि वह  मेरा  मुख  भी  नहीं देखना चाहता, तो उसे ग्लनिपूर्ण क्रोध उत्पन्न हुआ। प्रताप की ओर से चित्त लिन  हो  गया  और उसकी जो प्रेम और प्रतिष्टा उसके हृदय में थी वह  पल-भर  में  जल-कण  की  भांति  उड़ने  लगी। स्त्रियों का चित्त बहुत शीघ्र प्रभावग्राही होता है,जिस प्रताप के लिए वह अपना असतित्व  धूल में मिला देने को तत्पर थी, वही उसके एक बाल-व्यवहार को भी क्षमा नहीं कर सकता, क्या  उसका हृदय ऐसा संर्कीण है? यह विचार विरजन के हृदय में कांटें की भांति खटकने लगा।</p>
<p>आज से विरजन की सजीवता लुप्त हो गयी। चित्त पर एक बोझ-सा  रहने  लगा।  सोचती कि जब प्रताप मुझे भूल गये और मेरी रत्ती-भर भी प्रतिष्टा नहीं करते तो इस शोक से मै। क्यों  अपना प्राण घुलाऊं? जैसे ‘राम तुलसी से, वैसे तुलसी राम से’। यदि उन्हें मझसे घृणा है, यदि वह मेरा  मुखनहीं देखना चाहते हैं, तो मैं भी उनका मुख देखने से घ्रणा करती हूं और मुझे उनसे  मिलने  की  इच्छा नहीं। अब वह अपने ही ऊपर झल्ला उठतीकि मैं प्रतिक्षण उन्हीं की बातें क्यों सोचती हूं और  संकल्प करती कि अब उनका ध्यान भी मन में न आने दूंगी, पर तनिक देर में ध्यान फिर उन्हीं की  ओर  जा पहुंचता और वे ही विचार उसे बेचैन करने लगते। हृदय केइस संताप को शांत करने केलिए वह  कमलाचरण को सच्चे प्रेम का परिचय देने लगी। वह थोड़ी देर के लिए कहीं  चला  जाता,  तो  उसे  उलाहना देती। जितने रुपये जमा कर रखे थे, वे सब दे दिये कि अपने लिए सोने की घड़ी और चेन मोल ले  लो। कमला ने इंकारकिया तो उदास हो गयी। कमला यों ही उसका दास बना हुआ था,  उसके  प्रेम  का बाहुल्य देखकर और भी जान देने लगा। मित्रों ने सुना तो धन्यवाद देने लगे। मियां हमीद  और  सैयद अपने भाग्य को धिकारने लगे कि ऐसी स्नेही स्त्री हमको न मिली। तुम्हें वह बिन  मांगे  ही  रुपये देती है और यहां  स्त्रीयों की खींचतान से नाक में दम है। चाहेह  अपने पास कानी कौड़ी  न  हो, पर उनकी इच्छा अवश्य पूरी होनी चाहिये, नहीं तो प्रलय मच जाय। अजी और क्या कहें, कभी  घर में एक बीड़े पान के लिए भी चले जाते हैं, तो वहां  भी  दस-पांच  उल्टी-सीधी  सुने  बिना  नहीं<br />
चलता। ईश्वर हमको भी तुम्हारी-सी बीवी दे।</p>
<p>यह सब था, कमलाचरण भी प्रेम करता था और वृजरानी भी प्रेम करती थी परन्तु  प्रेमियों को संयोग से जो हर्ष प्राप्त होता है, उसका विरजन के मुख पर कोई चिह्न  दिखायी  नहीं  देता था। वह दिन-दिन दुबली और पतली होती जाती थी। कमलाचरण शपथ दे-देकर पूछताकि  तुम  दुबली क्यों होती जाती हो? उसे प्रसन्न् करने के जो-जो उपाय हो सकते करता, मित्रों से भी इस  विषय में सम्मति लेता, पर कुछ लाभ न होता था। वृजरानी हंसकर कह दिया करतीकि तुम कुछ  चिन्ता  न करो, मैं बहुत अच्छी तरह हूं। यह कहते-कहते उठकर उसके बालों में कंघी लगाने लगती या  पंखा  झलने लगती। इन सेवा और सत्कारों से कमलाचरण फूलर न समाता। परन्तु लकड़ी के  ऊपर  रंग  और  रोगन लगाने से वह कीड़ा नहीं मरता, जो उसके भीतर बैठा हुआ उसका कलेजा खाये जाता है।  यह  विचार कि प्रतापचंद्र मुझे भूल गये और मैं उनकी  में गिर गयी, शूल की भांति उसके हृदय को व्यथित  किया करता था। उसकी दशा दिनों – दिनों बिगड़ती गयी – यहां तक कि  बिस्तर  पर  से  उठना  तक कठिन हो गया। डाक्टरों की दवाएं होने लगीं।</p>
<p>उधर प्रतापचंद्र का प्रयाग में जी लगने लगा था। व्यायाम का तो  उसे  व्यसन  था  ही। वहां इसका बड़ा प्रचार था। मानसिक बोझ हलका करने के लिए शारीरिक श्रम से बढ़कर  और  कोई उपाय नहीं है। प्रात: कसरत करता, सांयकाल और फुटबाल खलता, आठ-नौ बजे  रात  तक  वाटिका की सैर करता। इतने परिश्रम के पश्चात् चारपाई पर गिरता तो प्रभात होने ही पर  आंख  खुलती। छ: ही मास में क्रिकेट और फुटबाल का कप्तान बन बैठा और दो-तीन मैच ऐसे खेले कि सारे  नगर  में धूम हो गयी।</p>
<p>आज क्रिकेट में अलीगढ़ के निपुण खिलाडियों से उनका सामना था।  ये  लोग  हिन्दुस्तान  के प्रसिद्व खिलाडियों को परास्त करविजय का डंका बजाते यहां आये थे। उन्हें अपनी विजय  में  तनिक भी  संदेह न था। पर प्रयागवाले भी निराश न थे। उनकी आशा प्रतापचंद्र पर  निर्भर  थी।  यदि वह आध घण्टे भी जम गया, तो रनों के ढेर लगा देगा। और यदि इतनी ही देर तक  उसका  गेंद  चल गया, तो फिर उधर का वार-न्यारा है। प्रताप को कभी इतना बड़ा मैच खेलने का  संयोग  नमिला था। कलेजा धड़क रहा था कि न जाने क्या हो। दस बजे खेल प्रारंभ हुआ। पहले अलीगढ़वालों के  खेलने की बारी आयी। दो-ढाई घंटे तक उन्होंने खूब करामात दिखलाई। एक  बजते-बजते  खेल  का  पहिला भाग समाप्त हुआ। अलीगढ़ ने चार सौ रन किये। अब प्रयागवालों की बारी आयी पर खिलाडियों  के हाथ-पांव फूले हुए थे। विश्वास हो गया कि हम न जीत सकेंगे। अब खेल का बराबर होना कठिन  है। इतने रन कौन करेगा। अकेला प्रताप क्या बना लेगा ?  पहिला खिलाड़ी आया  और  तीसरे  गेंद  मे विदा हो गया। दूसरा खिलाड़ी आया और कठिनता से पॉँच गेंद खेल सका। तीसरा  आया  और  पहिले ही गेंद में उड़ गया। चौथे ने आकर दो-तीन हिट लगाये, पर जम न सका। पॉँचवे साहब कालेज मे  एक थे, पर यां उनकी भी एक न चली। थापी रखते-ही-रखते चल दिये। अब प्रतापचन्द्र  दृढ़ता  से  पैर उठाता, बैट घुमाता मैदान में आयां दोनों पक्षवालों ने  करतल  ध्वनि  की।  प्रयोगवालों  की  श अकथनीय थी। प्रत्येक मनुष्य की दृष्टि प्रतापचन्द्र की ओर लगी हुई थी। सबके हृदय धड़क  रहे  थे। चतुर्दिक सन्नाटा छाया हुआ था। कुछ लोग दूर बैठकर र्दश्वर से प्रार्थना कर रहे  थे  कि  प्रताप की विजय हो। देवी-देवता स्मरण किये जो रहे  थे।  पहिला  गेंद  आया,  प्रताप  नेखली  दिया। प्रयोगवालों का साहस घट गया। दूसरा आया, वह भी खाली गया। प्रयागवालों का, कलेजा  नाभि तक बैठ गया। बहुत से लोग छतरी संभाल घर की ओर चले। तीसरा गेंद आया। एक  पड़ाके  की  ध्वनि हुई ओर गेंद लू (गर्म हवा) की भॉँति गगन भेदन करता हुआ हिट पर खड़े होनेवाले खिलाड़ी  से  ससौ गज ओग गिरा। लोगों ने तालियॉँ बजायीयं। सूखे धान में पानी पड़ा। जानेवाले  ठिठक  गये।  निरशे को आशा बँधी। चौथा गेंद आया और पहले गेंद से दस गज आगे गिरा। फील्डर  चौंके,  हिट  पर  मदद पहँचायी! पाँचवाँ गेंद आया और कट पर गया। इतने में ओवर हुआ। बालर बदले, नये बालर  पूरे  बधिक थे। घातक गेंद फेंकते थे। पर उनके पहिले ही गेंद को प्रताप के आकाश में भेजकर सूर्य  से  र्स्पश  करा दिया। फिर तो गेंद और उसकी थापी में मैत्री-सी हो गयी। गेंद आता और थापी से  पार्श्व  ग्रहण करके कभी पूर्व का मार्ग लेता, कभी पश्चिम का , कभी उत्तर का और कभी दक्षिण  का,  दौड़ते-दौड़ते फील्डरों की सॉँसें फूल गयीं, प्रयागवाले उछलते थे और तालियॉँ बजाते थे। टोपियॉँ   वायु  में उछल रही थीं। किसी न रुपये लुटा दिये और किसी ने अपनी सोने की जंजीर लुटा दी। विपक्षी  सब मन मे कुढ़ते, झल्लाते, कभी क्षेत्र का क्रम परिवर्तन  करते,  कभी  बालर  परिवर्तन  करते।  पर चातुरी और क्रीड़ा-कौशल निरर्थक हो रहा था। गेंद की थापी से मित्रता दृढ़ हो गयी  थी।  पूरे दो घन्टे तक प्रताप पड़ाके, बम-गोले और हवाइयॉँ छोड़तमा रहा  और  फील्डर  गंद  की  ओर  इस प्रकार लपकते जैसे बच्चे चन्द्रमा की ओर लपकते हैं।  रनों  की  संख्या  तीन  सौ  तक  पहुँच  गई। विपक्षियों के छक्के छूटे। हृदय ऐसा भर्रा गया  कि एक गेंद भी सीधा था। यहां तक कि प्रताप  ने पचास रन और किये और अब उसने अम्पायर से तनिक विश्राम करने के लिए अवकाश मॉँगा।  उसे  आता देखकर सहस्रों मनुष्य उसी ओर दौड़े और उसे बारी-बारी से गोद में उठाने लगे। चारों ओर  भगदड़  मच गयी। सैकड़ो छाते, छड़ियॉँ टोपियॉँ और जूते ऊर्ध्वगामी हो गये मानो वे भी उमंग में उछल  रहे  थे। ठीक उसी समय तारघर का चपरासी बाइसिकल पर आता हुआ दिखायी दिया।  निकट  आकर  बोला- ‘प्रतापचंद्र किसका नाम है!’ प्रताप ने चौंककर उसकी ओर देखा और चपरासी ने तार का  लिफाफा उसके हाथ में रख दिया। उसे पढ़ते ही प्रताप का बदन पीला हो गया। दीर्घ  श्वास  लेकर  कुर्सी पर बैठ गया और बोरला-यारो ! अब मैच का निबटारा तुम्हारे हाथ में  है।  मेंने  अपना  कर्तव्य-पालन कर दिया, इसी डाक से घर चला जाँऊगा।</p>
<p>यह कहकर वह बोर्डिंग हाउस की ओर चला। सैकड़ों मनुष्य पूछने लगे-क्या है ?   क्या  है? लोगों के मुख पर उदासी छा गयी पर उसे बात करने का कहॉँ अवकाश ! उसी समय  तॉँगे  पर  चढ़ा और स्टेशन की ओर चला। रास्ते-भर उसके मन में तर्क-वितर्क होते रहे। बार-बार अपने को  धिक्कार  देता कि क्यों न चलते समय उससे मिल लिया ?  न जाने अब भेंट हो कि न हो। ईश्वर न करे  कहीं उसके दर्शन से वंचित रहूँ;  यदि रहा तो मैं भी मुँह मे कालिख पोत कहीं मर रहूँगा। यह  सोच  कर कई बार रोया। नौ बजे रात को गाड़ी बनारस पहुँची। उस पर से उतरते ही सीधा  श्यामाचरण  के घर की ओर चला। चिन्ता के मारे ऑंखें डबडबायी हुईं थी और कलेजा धड़क रहा  था।  डिप्टी  साहब सिर झुकाये कुर्सी पर बैठे थे और कमला डाक्टर साहब के यहॉँ जाने को उद्यत था। प्रतापचन्द्र  को देखते ही दौड़कर लिपट गया। श्यामाचरण ने भी गले लगाया और बोले-क्या अभी सीधे इलाहाबाद  से चले आ रहे हो ?</p>
<p>प्रताप-जी हॉँ ! आज माताजी का तार पहुँचा कि विरजन की बहुत  बुरी  दशा  है।  क्या  अभी वही दशा है ?</p>
<p>श्यामाचरण-क्या कहूँ इधर दो-तीन मास से दिनोंदिन उसका शरीर क्षीण होता  जाता  है, औषधियों का कुछ भी असर नहीं होता। देखें, ईश्वर की क्या इच्छा है! डाक्टर साहब तो  कहते  थे, क्षयरोग है। पर वैद्यराज जी हृदय-दौर्बल्य बतलाते हैं।</p>
<p>विरजन को जब से सूचना मिली कि प्रतापचन्द्र आये हैं, तब से उसक हृदय में  आशा  और  भय घुड़दौड़ मची हुई थी। कभी सोचती कि घर आये होंगे, चाची ने बरबस ठेल-ठालकर  यहॉँ  भेज  दिया होगा। फिर ध्यान हुआ, हो न हो, मेरी बीमारी का समाचार पा, घबड़ाकर चले आये  हों,  परन्तु नहीं। उन्हें मेरी ऐसी क्या चिन्ता पड़ी है ?  सोचा  होगा-नहीं  मर  न  जाए,  चलूँ  सांसारिक व्यवहार पूरा करता आऊं। उन्हें मेरे मरने-जीने का क्या सोच ? आज मैं भी  महाशय  से  जी  खोलकर बातें करुंगी ? पर नहीं बातों की आवश्यकता ही क्या है ?  उन्होंने चुप साधी है, तो मैं क्या  बोलूँ ? बस इतना कह दूँगी कि बहुत अच्छी हूँ और आपके कुशल की कामना रखती हूँ ! फिर मुख  न  खोलूँगी ! और मैं यह मैली-कुचैली साड़ी क्यों पहिने हूँ ?  जो अपना सहवेदी न हो उसके आगे यह  वेश  बनाये रखने से लाभ? वह अतिथि की भॉँति आये हैं। मैं भी पाहुनी की  भॉँति  उनसे  मिलूँगी।  मनुष्य  का चित्त कैसा चचंल है? जिस मनुष्य की अकृपा ने विरजन की यह गति बना दी थी, उसी को जलाने  के लिए ऐसे-ऐसे उपाय सोच रही है।</p>
<p>दस बजे का समय था। माधवी बैठी पख झल रही थी। औषधियों की शीशियाँ इधर-उधर  पड़ी हुई थीं और विरजन चारपाई पर पड़ी हुई ये ही सब बातें सोच रही थी कि प्रताप  घर  में  आया। माधवी चौंककर बोली-बहिन, उठो आ गये। विरजन झपटकर उठी और चारपाई से उतरना चाहती  थी कि निर्बलता के कारण पृथ्वी पर गिर पड़ी। प्रताप ने उसे सँभाला और चारपाई पर  लेटा  दिया। हा! यह वही विरजन है जो आज से कई मास पूर्व रुप    एवं लावाण्य की मूर्ति थी,  जिसके  मुखड़े पर चमक और ऑखों में हँसी का वपास था, जिसका भाषण श्यामा  का  गाना  और  हँसना  मन  का लुभानाथ। वह रसीली ऑखोंवाली, मीठी बातों वाली विरजन आज केवल अस्थिचर्मावशेष है।  पहचानी नहीं जाती। प्रताप की ऑखों में ऑंसूं भर आये। कुशल पूछना चाहता  था,  पर  मुख  से  केवल  इतना निकला-विरजन !  और नेत्रों से जल-बिन्दु बरसने लगे। प्रेम की ऑंखे मनभावों के परखने  की  कसौटी है।  विरजन ने ऑंख उठाकर देखा और उन अश्रु-बिन्दुओं ने उसके मन का सारा मैल धो दिया।</p>
<p>जैसे कोई सेनापति आनेवाले युद्व का चित्र मन में सोचता है और शत्रु  को  अपनी  पीठ  पर देखकर बदहवास हो जाता है और उसे निर्धरित चित्र का कुछ ध्यान भी नहीं रहता,  उसी  प्रकार विरजन प्रतापचन्द्र को अपने सम्मुख देखकर सब बातें भूल गयी, जो अभी पड़ी-पड़ी सोच रही थी  ! वह प्रताप को रोते देखकर अपना सब दु:ख भूल गयी और चारपाई से  उठाकर  ऑंचल  से  ऑसूं  पोंछनेलगी। प्रताप, जिसे अपराधी कह सकते हैं, इस समय दीन बना हुआ था और विरजन –जिसने अपने  को सखकर इस श तक पहुँचाया था-रो-रोकर उसे कह रही थी- लल्लू चुप रहो,  ईश्वर  जानता  है,  मैं भली-भॉँति अच्छी हूँ। मानो अच्छा न होना उसका अपराध था।  स्त्रीयों  की  संवेदनशीलता  कैसी कोमल होती है! प्रतापचन्द्र के एक सधारण संकोच ने विरजन को इस जीवन से उपेक्षित बना  दिया था। आज ऑंसू कुछ बूँदों की उसके हृदय के उस सन्ताप, उस जलन और उस अग्नि कोशन्त कर दिया,  जो कई महीनों से उसके रुधिर और हृदय को जला रही थी। जिस रेग को बड़े-बड़े वैद्य और डाक्टर  अपनी औषधि तथा उपाय से अच्छा न कर सके थे, उसे अश्रु-बिन्दुओं ने क्षण-भर में चंगा कर दिया। क्या  वह पानी के बिन्दु अमृत के बिन्दु थे ?</p>
<p>प्रताप ने धीरज धरकर पूछा- विरजन! तुमने अपनी क्या गति बना रखी है ?</p>
<p>विरजन (हँसकर)- यह गति मैंने नहीं बनायी, तुमने बनायी है।</p>
<p>प्रताप-माताजी का तार न पहुँचा तो मुझे सूचना भी न होती।</p>
<p>विरजन-आवश्यकता ही क्या थी ?  जिसे भुलाने के लिए तो तुम प्रयाग चले गए, उसके  मरने-जीने की तुम्हें क्या चिन्ता ?</p>
<p>प्रताप-बातें बना रही हो। पराये को क्यों पत्र लिखतीं ?</p>
<p>विरजन-किसे आशा थी कि तुम इतनी दूर से आने का या पत्र लिखने का कष्ट उठाओगे ?   जो द्वार से आकर फिर जाए और मुख देखने से घण करे उसे पत्र भेजकर क्या करती?</p>
<p>प्रताप- उस समय लौट जाने का जितना दु:ख मुझे हुआ, मेरा चित्त ही जानता है। तुमने  उस समय तक मेरे पास कोई पत्र न भेजा था। मैंने सझ, अब सुध भूल गयी।</p>
<p>विरजन-यदि मैं तुम्हारी बातों को सच न समझती होती हो कह देती कि ये सब  सोची  हुई बातें हैं।</p>
<p>प्रताप-भला जो समझो, अब यह बताओ कि कैसा जी है? मैंने तुम्हें पहिचाना नहीं, ऐसा  मुख फीका पड़ गया है।</p>
<p>विरजन- अब अच्छी हो जाँऊगी, औषधि मिल गयी।</p>
<p>प्रताप सकेत समझ गया। हा, शोक! मेरी तनिक-सी चूक ने यह प्रलय कर  दिया।  देर  तक उसे सझता रहा और प्रात:काल जब वह अपने घर तो चला तो विरजन का बदन  विकसित  था।  उसे विश्वास हो गया कि लल्लू मुझे भूले नहीं है और मेरी सुध और प्रतिष्ठा उनके हृदय में  विद्यामन  है। प्रताप ने उसके मन से वह कॉँटा निकाल दिया, जो कई मास से खटक रहा था और जिसने उसकी  यह गति कर रखी थी। एक ही सप्ताह में उसका मुखड़ा स्वर्ण हो गया, मानो कभी बीमार ही न  थी।</p>
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		<title>वरदान &#8211; भ्रम</title>
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		<pubDate>Sun, 21 Aug 2011 14:56:39 +0000</pubDate>
		<dc:creator>&#2360;&#2306;&#2332;&#2351;</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रेमचंद]]></category>
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		<category><![CDATA[vardan]]></category>

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		<description><![CDATA[  वृजरानी की विदाई के पश्चात सुवामा का घर ऐसा सूना हो गया, मानो पिंजरे से सुआ  उड़ गया। वह इस घर का दीपक और शरीर की प्राण थी। घर वही है, पर चारों  ओर  उदासी  छायीहुई है। रहनेचाला वे ही है। पर सबके मुख मलिन और नेत्र ज्योतिहीन हो रहे है। वाटिका वही  है, पर ऋतु पतझड़ की है। विदाई के एक मास पश्चात्र मुंशी संजीवनलाल भी तीर्थयात्र करने  चले  गये। धन-संपत्ति सब प्रताप को सर्मिपत कर दी। अपने सग मृगछाला, भगवद् गीता और  कुछ  पुस्तकों  के अतिरिक्त कुछ न ले गये। <a href="http://hindikosh.in/archives/243">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a title="प्रेमचंद" href="http://hindikosh.in/premchand"><strong>प्रेमचंद</strong></a></p>
<p><a title="वरदान" href="http://hindikosh.in/premchand/vardan"><strong>वरदान</strong></a></p>
<p>वृजरानी की विदाई के पश्चात सुवामा का घर ऐसा सूना हो गया, मानो पिंजरे से सुआ  उड़ गया। वह इस घर का दीपक और शरीर की प्राण थी। घर वही है, पर चारों  ओर  उदासी  छायीहुई है। रहनेचाला वे ही है। पर सबके मुख मलिन और नेत्र ज्योतिहीन हो रहे है। वाटिका वही  है, पर ऋतु पतझड़ की है। विदाई के एक मास पश्चात्र मुंशी संजीवनलाल भी तीर्थयात्र करने  चले  गये। धन-संपत्ति सब प्रताप को सर्मिपत कर दी। अपने सग मृगछाला, भगवद् गीता और  कुछ  पुस्तकों  के अतिरिक्त कुछ न ले गये।<br />
<span id="more-243"></span><br />
प्रताचन्द्र की प्रेमाकांक्षा बड़ी प्रबल थीं पर इसके साथ ही उसे दमन  की  असीम  शक्ति भी प्राप्त थी। घर की एक-एक वस्तु उसे विरजन का स्मरण कराती रहती  थी।  यह  विचार  एक क्षण के लिए भी दूर न होता था यदि विरजन मेरी होती, तो ऐसे सुख से  जीवन  व्यतीत  होता।  परन्तु विचार को वह हटाता रहता था। पढ़ने बैठता तो पुस्तक खुली रहती और ध्यान  अन्यत्र  जा पहुंचता। भोजन करने बैठता तो विरजन का चित्र नेत्रों में फिरने लगता। प्रेमाग्नि  को  दमन  की शक्ति से दबाते-दबाते उसकी अवस्था ऐसी हो गयी, मानो वर्षों का रोगी है प्रेमियों  को  अपनी अभिलाषा पूरी होने की आशा  हो यान हो, परन्तु वे मन-ही-मन अपनी प्रेमिकाओं  से  मिलने  का आनन्द उठाते रहते है। वे भाव-संसार मे अपने प्रेम-पात्र से वार्तालाप करते हैं, उसे छोड़ते हैं,  उससे रुठते हैं, उसे मनाते है और इन थावों में उन्हें तृप्ति होती है आैश्र मन को एक सुखद और रसमय  कार्य मिल जाता है। परन्तु यदि कोई शक्ति उन्हें इस भावोद्यान की सैर करने से रोके, यदि कोई  शक्ति ध्यान में भी उस प्रियतम का चित्र् न देखने दे, तो उन अभागों प्रेमियों  को  क्या  दशा  होगा? प्रताप इन्ही अभागों में था। इसमें संदेह नहीं कि यदि वह चाहता तो सुखद भावों का  आनन्द  भोग सकता था। भाव-संसार का भ्रमणअतीव सुखमय होता है, पर कठिनता तो यह थी  कि  वह  विरजन का ध्यान भी कुत्सित वासनाओं से पवित्र् रखना चाहता था। उसकी शिक्षा ऐसे पवित्र  नियमों  से हुई थी और उसे ऐसे पवित्रत्माओं और नीतिपरायण मनुष्यों की संगति से लाभ उठाने क अवसर मिले  थे कि उसकी दृष्टि में विचार की पवित्र्ता की भी उतनी  ही  प्रतिष्ठा  थी  जितनी  आचार  की पवित्रता की। यह कब संभव था कि वह विरजन को-जिसे कई बार बहिन कह चुका था और जिसे  अब भी बहिन समझने का प्रयत्न करता रहता था- ध्यानावस्था में भी ऐसे भावों का केंद्र बनाता,  जो कुवासनाओं  से भले ही शुद्व हो, पर मन की दूषित आवेगों से मुक्त नहीं हो सकते थे जब तक  मुन्शीजी संजीवनलाल विद्यमान थे, उनका कुछ-न-कुछ समय उनके संग ज्ञान और धर्म-चर्चा में कट  जाता  था, जिससे आत्मा को संतोष होता था ! परन्तु उनके चले जाने के पश्चात आत्म-सुधार का यह  अवसर  भी जाता रहा।</p>
<p>सुवामा उसे यों मलिन-मन पाती तो उसे बहुत दु:ख  होता।  एक  दिन  उसने  कहा-  यदि तुम्हारा चित्त न लगता हो, प्रयाग चले जाओ वहाँ शायद तुम्हारा  जी  लग  जाए।  यह  विचार प्रताप के मन में भी कई बार उत्पन्न हुआ था, परन्तु इस भय से कि माता को यहां  अकेले  रहने  में कष्ट होगा, उसने इस पर कुछ ध्यान नहीं दिया था। माता का  आदेश  पाकर  इरादा  पक्का  हो गया। यात्रा की तैयारियां करने लगा, प्रस्थान का दिन निश्चित हो गया। अब सुवामा  की  यह दशा है कि जब देखिए, प्रताप को परदेश में रहने-सहने की शिक्षाएं दे रही है-बेटा, देखों किसी  से झगड़ा मत मोल लेना।झगड़ने की तुम्हारी वैसे भी आदत नहीं है, परन्तु समझा  देती  हूँ।  परदेश  की बात है फूंक-फूंककर पग धरना। खाने-पीने में असंयम न करना। तुम्हारी यह बुरी आदत है कि जाड़ों  में सांयकाल ही सो जाते हो, फिर कोई  कितना ही बुलाये पर जागते ही नहीं। यह स्वभाव परदेश  में भी बना रहे तो तुम्हें सांझ का भोजन काहे को मिलेगा?  दिन को थोड़ी देर  के  लिए  सो  लिया करना। तुम्हारी आंखों में तो दिन को जैसे नींद नहीं आती।</p>
<p>उसे जब अवकाश मिला, बेटे को ऐसी समयोचित शिक्षाएं दिया करती। निदान प्रस्थान  का दिन आ ही गया। गाड़ी दस बजे दिन को छूटती थी। प्रताप ने सोचा-  विरजन  से  भेंट  कर  लूं। परदेश जा रहा हूँ। फिर न जाने कब भेंट हो। चित को उत्सुक किया। माता से  कह  बैठा।  सुवामा बहुत प्रसन्न हुई। सुवामा बहुत प्रसन्न हुई। एक थाल में मोदक समोसे और दो-तीन प्रकार के  मुरब्बे रखकर रधियाको दिये कि लल्लू के संग जा। प्रताप ने बाल बनवाये, कपड़े बदले। चलने को तो  चला, पर ज्यों-ज्यों पग आगे उठाता है, दिल बैठा जाता है। भांति-भांति के विचार आ रहे है। विरजन  न जाने क्या मन में समझे, क्या सन समझे। चार महीने बीत गये, उसने एक चिट्ठी भी तो मुझें  अलग  से  नहीं लिखी। फिर क्योंकर कहूं कि मेरे मिलने से उसे  प्रसन्नता  होगी।  अजी,  अब  उसे  तुम्हारी चिन्ता ही क्या है? तुम मर भी जाओ तो वह आंसू न बहाये। यहां की  बात  और  थी।  वह  अवश्य उसकी आँखों में खटकेगा। कहीं यह न समझे कि लालाजी बन-ठनकर मुझे रिझाने  आये  हैं।  इसी  सोच-विचार में गढ़ता चला जाता था। यहाँ तक कि श्यामाचरण का  मकान  दिखाई  देने  लगा।  कमला मैदान टहल रहा था उसे देखते ही प्रताप की वह दशा हो  गई  कि  जो  किसी  चोर  की  दशा सिपाही को देखकर होती है झट एक घर कर आड़ में छिप गया और रधिया  से  बोला-  तू  जा,  ये वस्तुएँ दे आ। मैं कुछ काम से बाजार जा रहा हूँ। लौटता हुआ जाऊँगा। यह कह  कर बाजार  की  ओर चला, परन्तु केवल दस ही डग चला होेगा कि पिर महरी को बुलाया और बोला- मुझे शायद देर  हो जाय, इसलिए न आ सकूँगा। कुछ पूछे तो यह चिट्ठी दे देना, कहकर जेब से पेन्सिल निकाली  और  कुछ पंक्तियां लिखकर दे दी, जिससे उसके हृदय की दशा का भली-भंति परिचय मिलता है।</p>
<p>“मैं आज प्रयाग जा रहा हूँ, अब वहीं पढूंगा। जल्दी के कारण तुमसे नहीं मिल सका।  जीवित रहूँगा तो फिर आऊँगा। कभी-कभी अपने कुशल-क्षेम की सूचना देती रहना।</p>
<p>तुम्हारा<br />
प्रताप”</p>
<p>प्रताप तो यह पत्र देकर चलता हुआ, रधिया धीरे-धीरे विरजन के घर पहुँची। वह इसे  देखते ही दौड़ी और कुशल-क्षेम पूछने लगी-लाला की कोई चिट्ठी आयी थी?</p>
<p>रधिया- जब से गये, चिट्ठी-पत्री कुछ भी नहीं आयी।</p>
<p>विरजन- चाची तो सूख से है?</p>
<p>रधिया– लल्लू बाबू प्रयागराज जात है तीन तनिक उदास रहत है।</p>
<p>विरजन – (चौंककर) लल्लू प्रयाग जा रहे हैं।</p>
<p>रधिया – हां, हम सब बहुत समझाया कि परदेश मां कहां जैहो। मुदा कोऊ की सनुत है?</p>
<p>रधीया – कब जायेंगे?</p>
<p>रधीया – आज दस बजे की टे से जवय्या है। तुसे भेंट करन आवत रहेन, तवन दुवारि पर आइ  के लवट गयेन।</p>
<p>विरजन – यहं तक आकर लौट गये। द्वार पर कोई था कि नहीं?</p>
<p>रधीया – द्वार पर कहां आये, सड़क पर से चले गये।</p>
<p>विरजन – कुछ कहा नहीं, क्यां लौटा जाता हूं?</p>
<p>रधीया – कुछ कहा नहीं, इतना बोले कि ‘हमार टेम छहिट जहै, तौन हम जाइत हैं।’</p>
<p>विरजन ने घड़ी पर दृष्टि डाली, आठ बजने वाले थे।  प्रेमवती  के  पास  जाकर  बोली  – माता! लल्लू आज प्रयाग जा रहे हैं, दि आप कहें तो उनसे मिलती आऊं। फिर  न  जाने  कब  मिलना हो, कब न हो। महरी कहती है कि बस मुझसेमिलने आते थे, पर सड़क के उसी पार से लौट गये।</p>
<p>प्रेमवती – अभी न बाल गुंथवाये, न मांग भरवायी, न कपड़े बदले बस जाने  को  तैयार  हो गयी।</p>
<p>विरजन – मेरी अम्मां! आज जाने दीजिए। बाल गुंथवाने बैठूंगी तो दस यहीं बज जायेंगे।</p>
<p>प्रेमवती – अच्छा, तो जाओ, पर संध्या तक लौट आना। गाड़ी तैयार करवा लो,  मेरी  ओर से सुवामा को पालगन कह देना।</p>
<p>विरजन ने कपड़े बदले, माधवी को बाहर दौड़ाया कि गाड़ी तैयार करने के  लिए  कहो  और तब तक कुछ ध्यान न आया। रधीया से पूछा – कुछ चिट्टी-पत्री नहीं दी?</p>
<p>रधिया ने पत्र निकालकर दे दिया। विरजन ने उसे हर्ष सेलिया, परन्तु उसे पढ़ते ही  उसका मुख कुम्हला गया। सोचने लगीकि वह द्वार तक आकर क्यों लौट गये और पत्र  भी  लिखा  तो  ऐसा उखड़ा और अस्पष्ट। ऐसी कौन जल्दी थी? क्या गाड़ी के नौकर थे, दिनभर में अधिक नहीं  तो  पांच – छ: गाडियां जाती होंगी। क्या मुझसे मिलने के लिए उन्हे दो घंटों का  विलम्ब  भी  असहय  हो गया? अवश्य इसमें कुछ-न-कुछ भेद है। मुझसे क्या अपराध हुआ? अचानक उसे उस सय  का  ध्यान  आया, जब वह अति व्याकुल हो प्रताप के पास गयी थी और उसके मुख से निकला था, ‘लल्लू मुझसे कैसे  सहा जायेगा!’विरजन को अब से पहिले कई बार ध्यान आ चुका कि मेरा उस समय उस दशा में जाना  बहुत अनुचित था। परन्तु विश्वास हो गया कि मैं अवश्य लल्लू की दृष्टि से गिर गयी। मेरा प्रेम और  मन अब उनके चित्तमें नहीं है। एक ठण्डी सांस लेकर बैठ गयी और माधवी से बोली  –  कोचवान  से  कह दो, अब गाड़ी न तैयार करें। मैं न जाऊंगी।</p>
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		<title>वरदान &#8211; कायापलट</title>
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		<pubDate>Sun, 21 Aug 2011 14:53:46 +0000</pubDate>
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				<category><![CDATA[प्रेमचंद]]></category>
		<category><![CDATA[premchand]]></category>
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		<description><![CDATA[यहां आज बड़ी भीड़ थी। एक मेला-सा लगा हुआ था।  भिश्ती छिड़काव कर रहे थे,  सिगरेट, खोमचे वाले और तम्बोली सब अपनी-अपनी दुकान लगाये बैठे थे। नगर के मनचले युवक  अपने  हाथों  में बटेर लिये या मखमली अड्डों पर बुलबुलों को बैठाये मटरगश्ती कर रहे थे कमलाचरण  के  मित्रों  की यहां क्या कमी थी? लोग उन्हें खाली हाथ देखते तो पूछते – अरे राजा साहब! आज खाली हाथ  कैसे? इतने में मियां, सैयद मजीद, हमीद आदि नशे में चूर,  सिगरेट  के  धुऐं  भकाभक  उड़ाते  दीख  पड़े। कमलाचरण को देखते ही सब-के-सब सरपट दौड़े और उससे लिपट गये। <a href="http://hindikosh.in/archives/241">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a title="प्रेमचंद" href="http://hindikosh.in/premchand"><strong>प्रेमचंद</strong></a></p>
<p><a title="वरदान" href="http://hindikosh.in/premchand/vardan"><strong>वरदान</strong></a></p>
<p>पहला दिन तो कमलाचरण ने किसी प्रकार छात्रालय में काटा।  प्रात:  से  सायंकाल  तक सोया किये। दूसरे दिन ध्यान आया कि आज नवाब साहब और तोखे मिर्जा के बटेरों  में  बढ़ाऊ  जोड़ हैं। कैसे-कैसे मस्त पट्ठे हैं! आज उनकी पकड़ देखने के योग्य होगी। सारा नगर  फट  पड़े  तो  आश्चर्य नहीं। क्या दिल्लगी है कि नगर के लोग तो आनंद उड़ायें और मैं पड़ा रोऊं।  यह  सोचते-सोचते  उठा और बात-की-बात में अखाड़े में था।</p>
<p>यहां आज बड़ी भीड़ थी। एक मेला-सा लगा हुआ था।  भिश्ती छिड़काव कर रहे थे,  सिगरेट, खोमचे वाले और तम्बोली सब अपनी-अपनी दुकान लगाये बैठे थे। नगर के मनचले युवक  अपने  हाथों  में बटेर लिये या मखमली अड्डों पर बुलबुलों को बैठाये मटरगश्ती कर रहे थे कमलाचरण  के  मित्रों  की यहां क्या कमी थी? लोग उन्हें खाली हाथ देखते तो पूछते – अरे राजा साहब! आज खाली हाथ  कैसे? इतने में मियां, सैयद मजीद, हमीद आदि नशे में चूर,  सिगरेट  के  धुऐं  भकाभक  उड़ाते  दीख  पड़े। कमलाचरण को देखते ही सब-के-सब सरपट दौड़े और उससे लिपट गये।<br />
<span id="more-241"></span><br />
मजीद – अब तुम कहां गायब हो गये थे यार, कुरान की कसम मकान के सैंकड़ो  चक्कर  लगाये होंगे।</p>
<p>रामसेवक – आजकल आनंद की रातें हैं, भाई! आंखें नहीं देखते हो, नशा-सा चढ़ा हुआ है।</p>
<p>चन्दुलाल – चैन कर रहा है पट्ठा। जब से सुन्दरी घर में आयी, उसने बाजार  की  सूरत  तक नहीं देखी। जब देखीये, घर में घुसा रहता है। खूब चैन कर ले यार!</p>
<p>कमला – चैन क्या खाक करुं? यहां तो कैद में फंस गया। तीन दिन से बोर्डिंग  में  पड़ा  हुआ हूं।</p>
<p>मजीद &#8211; अरे! खुदा की कसम?</p>
<p>कमला – सच कहता हूं, परसों से मिट्टी पलीद हो रही है। आज सबकी  आंख  बचाकर  निकल भागा।</p>
<p>रामसेवक – खूब उड़े। वह मुछंदर सुपरिण्टेण्डण्ट झल्ला रहा होगा।</p>
<p>कमला – यह मार्के का जोड़ छोड़कर किताबों में सिर कौन मारता।</p>
<p>सैयद – यार, आज उड़ आये तो क्या? सच तो यह है कि तुम्हारा वहां रहना आफत  है।  रोज तो न आ सकोगे? और यहां आये दिन नयी सैर, नयी-नयी बहारें, कल  लाला   डिग्गी  पर,  परसों प्रेट पर, नरसों बेड़ों का मेला-कहां तक गिनाऊं, तुम्हारा जाना बुरा हुआ।</p>
<p>कमला – कल की कटाव तो मैं जरुर देखूंगा, चाहे इधर की दुनिया उधर हो जाय।</p>
<p>सैयद – और बेड़ों का मेला न देखा तो कुछ न देखा।</p>
<p>तीसरे पहर कमलाचरण मित्रों से बिदा होकर उदास मन छात्रालय की ओर चला। मन में  एक चोर-सा बैठा हुआ था। द्वार पर पहुंचकर झांकने लगाकि सुपरिण्टेण्डेण्ट साहब न  हों  तो  लतपककर कमरे में हो रहूं। तो यह देखता है कि वह भी बाहर ही की ओर आ रहे हैं।  चित्त  को  भली-भांति दृढ़ करके भीतर पैठा।</p>
<p>सुरिण्टेण्डेण्ट साहब ने पूछा – अब तक हां थे?</p>
<p>‘एक काम से बाजार गया था’।</p>
<p>‘यह बाजार जाने का समय नहीं है’।</p>
<p>‘मुझे ज्ञात नहीं था, अब ध्यान रखूंग को जब कमला चारपाई पर लेटा तो  सोचने  लगा  – यार, आज तो बच गया, पर उत्तम तभी हो कि कल बचूं। और परसों भी  महाशय  की  आंख  में  धूल डालूं। कल का दृश्य वस्तुत:दर्शनीय होगा। पतंग आकाश में बातें करेंगे और लम्बे-लम्बे  पेंच  होंगे।  यह  ध्यान करते-करते सो गया। दूसरे दिन प्रात: काल  छात्रालय  से   निकल  भागा।  सुहृदगण  लाल डिग्गी पर उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। देखते ही गदगद् हो गये और पीठ ठोंकी।</p>
<p>कमलाचरण कुछ देर तक तो कटाव देखता रहा। फिर शौक चर्राया कि क्यों न  मैं  भी  अपने कनकौए मंगाऊं और अपने हाथों की सफाई  दिखलाऊं। सैयद  ने भड़काया, बद-बदकर लड़ाओ। रुपये  हम देंगे।चट घर पर आदमी दौड़ा दिया। पूरा विश्वास था कि अपने मांझे से सबको  परास्त  कर  दूंगा। परन्तु जब आदमी घर से खाली हाथ आया, तब तो उसकी देह में आग-सी-लग गयी। हण्टर लेकर  दौड़ा और घर पहुंचते ही कहारों को एक ओर से सटर-सटर पीटना आरंभ किया। बेचारे  बैठे  हुक्का:  तमाखू कर रहे थे। निरपराध अचानक हण्टर पड़े तो  चिल्ला-चिल्लाकर रोने  लेगे।  सारे  मुहल्ले   में  एक कोलाहल मच गया। किसी को समझ ही में न आया कि हमारा क्या दोष है? वहां कहारों का  भली-भांति सत्कार करके कमलाचरण अपने कमरे में पहुंचा। परन्तु वहां की दुर्दशा  देखकर  क्रोध  और  भी प्रज्ज्वलित हो गया। पतंग फटे हुए थे, चर्खियां टूटी हुई थीं, मांझे लच्छियां उलझ् पड़ीं थीं,  मानो किसी आपति ने इन यवन योद्वाओं का सत्यानाश कर दिया था। समझ गया कि अवश्य  यह  माताजी की करतूत है। क्रोध से लाल माता के पास गया और उच्च स्वर से बोला – क्या मां! तुम सचमुच  मेरे प्राण ही लेने पर आ गयी हो? तीन दिन हुए कारागार में भिजवाया पर इतने पर  भी  चित्त  को संतोष न हुआ। मेरे विनोद की सामग्रियों को नष्ट कर डाला क्यों?</p>
<p>प्रेमवती – (विस्मय से) मैंने तुम्हारी कोई चीज़ नहीं छुई! क्या हुआ?</p>
<p>कमला – (बिगड़कर) झूठों के मुख में कीड़े पड़ते हैं। तुमने मेरी वस्तुएं  नहीं  छुई  तो  किसको साहस है जो मेरे कमरे में जाकर मेरे कनकौए और चर्खियां सब तोड़-फोड़ डाले, क्या इतना  भी  नहीं देखा जाता।</p>
<p>प्रेमवती – ईश्वर साक्षी है। मैंने तुम्हारे कमरे में  पांव भी नहीं रखा।  चलो,  देखूं  कौन-कौन चीज़ें टूटी हैं। यह कहकर प्रेमवती तो इस कमरे की ओर चली और कमला क्रोध से भरा  आंगन  में खड़ा रहा कि इतने में माधवी विरजन के कमरे से निकली और उसके हाथ में  एक  चिट्टी  देकर  चली गयी। लिखा हुआ था-</p>
<p>‘अपराध मैंने किया है। अपराधिन मैं हूं। जो दण्ड चाहे दीजिए’।</p>
<p>यह पत्र देखते ही कमला भीगी बिल्ली बन गया और दबे पांव बैठक की ओर  चला।  प्रेमवती पर्दे की आड़ से सिसकते हुए नौकरों को डांट रही थी, कमलाचरण ने उसे मना किया और  उसी  क्षण कुछ और कनकौए जो बचे हुए थे, स्वंय फाड़  डाले,  चर्खियां  टुकड़े-टुकड़े  कर  डालीं  और  डोर  मेंदियासलाई लगा दी। माता के ध्यान ही में नहीं आता था कि क्या बात है?  कहां  तो  अभी-अभी इन्हीं वस्तुओं के लिए संसार सिर पर उठा लिया था,  और कहा आप  ही  उसका  शत्रु  हो  गया। समझी, शायद क्रोध से ऐसा कर रहा हों मानाने लगीं, पर कमला की आकृति से  क्रोध  तनिक  भी प्रकट न होता था। सिथरता से बोला – क्रोध में नहीं हूं। आज से दृढ़ प्रतिज्ञा करता हूं कि  पतंग कभी न उड़ाऊँगां मेरी मूर्खता थी, इन वस्तुओं के लिए आपसे झगड़ बैठा।</p>
<p>जब कमलाचरण कमरे में अकेला रह गया तो सोचने लगा-निस्सन्देह  मेरा  पतंग  उड़ाना  उन्हे नापसन्द है, इससे हार्दिक घृणा है; नहीं तो मुझ पर यह अत्याचार कदापि  न  करतीं।  यदि  एक बार उनसे भेंट हो जाती तो पूछता कि तुम्हारी क्या इच्छा है;  पर  कैसे  मुँह  दिखाऊँ।  एक  तो महामूर्श, तिस पर कई बार अपनी मूर्खता का परिचय दे चुका। सेंधवाली  घटना  की  सूचना  उन्हें अवश्य मिली होगी। उन्हें मुख दिखाने के योग्य नहीं रहा। अब तो यही उपाय है कि न  तो  उनका मुख देखूँ न अपना दिखाऊँ, या किसी प्रकार कुछ विद्या सीखूँ। हाय ! इस सुन्दरी ने  कैसार  स्वरुप पाया है! स्त्री नीह अप्सरा जान पड़ती है। क्या अभी वह दिन भी होगा जब कि वह  मुझसे  प्रेम करेगी?  क्या लाल-लाल रसीले अधर है! पर है कठोर हृदय। दया तो उसे छू नही  गयी।  कहती  है जो दण्ड दूँ?  यदि पा जाऊँ हृदय से लगा लू। अच्छा, तो अब आज से  पढ़ना  चाहिये।  यह  सोचते-सोचते उठा और दरबा खोलकर कबूतरों का उड़ाने लगा। सैकड़ो जोड़े  थे  ओर  एक-से-एक  बढ़-चढ़कर। आकाश मे तारे बन जाएँ, ड़े तो दिन-भर उतरने का नाम न लें। जगर क बूतरबाज  एक-एक  जोड़  पर गुलामी करने को तैयार थे। परन्तु क्षण-मात्र में सब-के-सब उड़ा दिय। जब दरबा खाली  हो  गया, तो कहाररों को आज्ञा दी कि इसे उठा ले जाओ और आग में जला दो। छत्ता भी  गिरा  दो,  नहीं तो सब कबूतर जाकर उसकी पर बैठेंगें। कबूतरों का काम समाप्त करके बटेरों और बुलबुलों की  ओर  चले और उनकी भी कारागार से मुक्त कर दिया।</p>
<p>बाहर तो यह चरित्र हो रहा था, भीतर प्रेमवती छाती पीट रही थी कि ल़का  न  जाने क्या करने तर तत्पर हुआ है?  विरजन को बुलाकर कहा-बेटी? बच्चे को किसी  प्रकार  रोको।  न-जाने उसने मन मे क्या ठानी है? यह कहक रोने लगी! विरजन को भी सन्देह हो रहा था कि  अवश्य इनकी कुछ और नयीत है नहीं तो यह क्रोध क्यों?  यद्यपि कमला दुर्व्यसनी  था,  दुराचारी  था, कुचरित्र था, परन्तु इन सब दोषों के होते हुए भी उसमें एक बड़ा गुण भी था, जिसका  कोई  स्त्री अवहेलना नहीं कर सकती। उसे वृजरानी से स्ववी प्रीति थी। और इसका  गुप्  रीति  से  कई  बार परिचय भी मिल गया था। यही कारण था जिसेन विरजन को इतना गर्वशील बना दिया था।  उसने कागेज निकाला और यह पत्र बाहर भेजा।</p>
<p>“प्रियतम,<br />
यह कोप किस पर है? केवल इसीलिए कि मैंने दो-तीन कनकौए फाड़ृ डाले?  यदि  मुझे  ज्ञात होता कि आप इतनी-सी बात पर ऐसे क्रुद्व हो जायेंगे, तो कदापि उन पर हाथ  न  लगाती।  पर अब तो अपराध हो गया, क्षमा कीजिये। यह पहला कसूर है</p>
<p>आपकी<br />
वृजरानी।”</p>
<p>कमलाचरण यह पत्र पाकर ऐसा प्रमुदित हुआ, माने सारे जगत की संपत्ति प्राप्त हो  गयी।  उत्तर देने की इच्छा हुई, पर लेखनी ही नहीं उठती थी। न प्रशस्ति मिलती है, न  प्रतिष्ठा,  न आरंभ का विचार आता, न समाप्ति का। बहुत चाहते हैं कि भावपूर्ण लहलहाता हुआ पत्र  लिखूं,  पर बुद्वि तनिक भी नहीं दौड़ती। आज प्रथम बार कमलाचरण को अपनी  मुर्खता  और  निरक्षरता  पर रोना आया। शोक ! मैं एक सीधा-सा पत्र भी नहीं लिख सकता। इस विचार से वह रोने  लगा  और घर के द्वार सब बन्द कर लिये कि कोई देख न ले।</p>
<p>तीसरे पहर जब मुंशी श्यामाचरण घर आये, तो सबसे पहली वस्तु जो उनकी  दृष्टि  में  पड़ी, वह आग का अलावा था। विस्मित होकर नौकरों से पूडा-यह अलाव कैसा?</p>
<p>नौकरों ने उत्तर दिया-सरकार ! दरबा जल रहा है।</p>
<p>मुंशीजी- (घुड़ककर) इसे क्यों जलाते हो? अब कबूतर कहाँ रहेंगे?</p>
<p>कहार-छोटे बाबू की आज्ञा है कि सब दरबे जला दो</p>
<p>मुंशीजी- कबूतर कहाँ गये?</p>
<p>कहार-सब उड़ा दिये, एक भी नहीं रखा। कनकौए सब फाड़  डाले,  डोर  जला  दी,  बड़ा नुकसान किया।</p>
<p>कहरों ने अपनी समझ में मार-पीट का बउला लिया। बेचारे समझे कि मुंशीजी इस  नुकासन  के लिये कमलाचरण को बुरा-भला कहेंगे, परन्तु मंशीजी ने यह समाचार  सुना  तो  भैंचक्के-से  रह  गये। उन्ही जानवरों पर कमलाचरण प्राण देता था, आज अकस्मात् क्या कायापलट हो गयी?   अवश्य  कुछ भेद है। कहार से कहा- बच्चे को भेज दो।</p>
<p>एक मिनट में कहार ने आकर कहा- हजुर, दरवाजा भीतर से बन्द है। बहुत खटखटाया,  बोलते ही नहीं।</p>
<p>इतना सुनना था कि मुंशीजी का रुधिर शुष्क हो गया। झट सन्देह हुआ कि बच्चे ने  विष  खा लिया। आज एक जहर खिलाने के मुकदमें का फैसला किया था। नंगे,  पाँव  दौड़े  और  बन्द  कमरे  के किवाड़ पर बजपूर्वक लात मारी और कहा- बच्चा! बच्चा! यह कहते-कहते गला रुँध गया।  कमलाचरण पिता की वाणी पहिचान कर झट उठा और अपने आँसूं पोंछकर किवाड़ खोल दिया। परन्तु उसे  कितना आश्चर्य हुआ, जब मुंशीजी ने धिक्कार, फटकार के बदले उसे हृदय से लगा  लिया  और  व्याकुल  होकर पूछा-बच्चा, तुम्हे मेरे सिर की कसम, बता दो तुमने कुछ खा तो नहीं  लिया?   कमलाचरण  ने  इस प्रश्न का अर्थ समझने के लिये मुंशीजी की ओर आँखें उठायी तो उनमें जल भरा था, मुंशीजी  को  पूरा विश्वास हो गया कि अवश्यश् विपत्ति का सामना हुआ। एक कहार से कहा-डाक्टर साहब  को  बुला ला। कहना, अभी चलिये।</p>
<p>अब जाकर दुर्बुद्वि कमेलाचरण ने पिता की इस घबराहट  का  अर्थ  समझा।  दौड़कर  उनसे लिपट गया और बोला- आपको भ्रम हुआ है। आपके   सिर की कसम, मैं बहुत अच्छी तरह हूँ।</p>
<p>परन्तु डिप्टी साहब की बुद्वि स्थिर न थी ;   समझे,  यह  मुझे  रोककर  विलम्ब  करना चाहता है। विनीत भाव से बोले-बच्चा?  ईश्वर के लिए मुझे छोड़ दो, मैं सन्दूक  से  एक  औषधि  ले आऊँ। मैं क्या जानता था कि तुम इस नीयत से छात्रालय में जा रहे हो।</p>
<p>कमलाचरण- इर्श्वर-साक्षी से कहता हूँ, मैं बिलकुल अच्छा हूँ। मैं ऐसा लज्जावान होता,  तो इतना मूर्ख क्यों बना रहता?  आप व्यर्थ ही डाक्टर साहब को बुला रहे हैं।</p>
<p>मुंशीजी- (कुछ-कुछ विश्वास करके) तो किवाड़ बन्द कर क्या करते थे?</p>
<p>कमलाचरण- भीतर से एक पत्र आया था, उत्तर लिख रहा था।</p>
<p>मुंशीजी- और यह कबूतर वगैरह क्यों उड़ा दिये?</p>
<p>कमला- इसीलिए कि निश्चिंतापूर्वक पढूँ। इन्हीं बखेड़ों में समय नष्ट  होता  था।  आज  मैनें इनका अन्त कर दिया। अबा आप देखेंगे कि मैं पढ़ने में कैसा जी लगाता हूँ।</p>
<p>अब जाके डिप्टी साहब की बुद्वि ठिकाने आयी। भीतर जाकर प्रेमवती से समाचार पूछा  तो उसने सारी रामायण कह सुनायी। उन्होंने जब सुना कि विरजन ने क्रोध में आकर  कमला  के  कनकौए फाड़ डाले और चर्ख्रिया तोड़ डाली तो हंस पड़े और कमलाचरण के विनोद के सर्वनाश का  भेद  समझ में आ गया। बोले-जान पड़ता है कि बहू इन लालजी को सीधा करके छोड़ेगी।</p>
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		<title>वरदान &#8211; कमलाचरण के मित्र</title>
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		<pubDate>Sun, 21 Aug 2011 14:51:44 +0000</pubDate>
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				<category><![CDATA[प्रेमचंद]]></category>
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		<category><![CDATA[vardan]]></category>

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		<description><![CDATA[    जैसे सिन्दूर की लालिमा से मांग रच जाती है, जैसे ही विरजन के आने से प्रेमवती के घर  की रौनक बढ गयी। सुवामा ने उसे ऐसे गुण सिखाये थे कि जिसने उसे देखा, मोह  गया।  यहां  तक  कि सेवती की सहेली रानी को भी प्रेमवती के सम्मुख स्वीकार करना पड़ा कि तुम्हारी  छोटी  बहू  ने हम सबों का रंग फीका कर दिया। सेवती उससे दिन-दिन भर बातें करती और उसका जी  न  ऊबता। उसे अपने गाने पर अभिमान था, पर इस क्षेत्र में भी विरजन बाजी ले गयी। <a href="http://hindikosh.in/archives/239">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a title="प्रेमचंद" href="http://hindikosh.in/premchand"><strong>प्रेमचंद</strong></a></p>
<p><a title="वरदान" href="http://hindikosh.in/premchand/vardan"><strong>वरदान</strong></a></p>
<p>जैसे सिन्दूर की लालिमा से मांग रच जाती है, जैसे ही विरजन के आने से प्रेमवती के घर  की रौनक बढ गयी। सुवामा ने उसे ऐसे गुण सिखाये थे कि जिसने उसे देखा, मोह  गया।  यहां  तक  कि सेवती की सहेली रानी को भी प्रेमवती के सम्मुख स्वीकार करना पड़ा कि तुम्हारी  छोटी  बहू  ने हम सबों का रंग फीका कर दिया। सेवती उससे दिन-दिन भर बातें करती और उसका जी  न  ऊबता। उसे अपने गाने पर अभिमान था, पर इस क्षेत्र में भी विरजन बाजी ले गयी।</p>
<p>अब कमलाचरण के मित्रो ने आग्रह करना शुरू किया कि भाई, नई दुलहिन घर में  लाये  हो, कुछ मित्रों की भी फिक्र करों। सुनते है परम सुन्दरी पाये हो।<br />
<span id="more-239"></span><br />
कमलाचरण को रूपये तो ससुराल से मिले ही थे, जेब खनखनाकर बोले-अजी, दावत लो।  शराबें उड़ाओ। हॉ, बहुत शोरगुल न मचाना, नहीं तो कहीं भीतर खबर होगी तो समझेगें कि  ये  गुण्डे  है। जब से वह घर में आयी है, मेरे तो होश उड़े हुए है। कहता हूं, अंग्रेजी, फारसी,  संस्कृत,  अलम-गलम सभी घोटे बैठी है। डरता हूं कहीं अंग्रेजी में कुछ पूछ बैठी, या फारसी में बातें करने लगे, मुहॅ  ताकने के सिवाय और क्या करूंगा ? इसलिए अभी जी बचाता फिरता हूं।</p>
<p>यों तो कमलाचरण के मित्रों  की  संख्या  अपरिमित  थी।  नगर  के  जितने  कबूतर-बाज, कनकौएबाजा गुण्डे थे सब उनके मित्र परन्तु सच्चे मित्रों में केवल पांच महाशय  थे  और  सभी-के-सभी फाकेमस्त छिछोरे थे। उनमें सबसे अधिक शिक्षित मिया मजीद थे। ये कचहरी में  अरायज  किया  करते थे। जो कुछ मिलता, वह सब शराब में भेट करते। दूसरा नम्बर हमीदंखा का था। इन महाशय ने  बहुत पैतृक संपति पायी थी, परन्तु तीन वर्ष में सब कुछ विलास में लुटा दी। अब यह ढंग  था  कि  सांय  को सज-धजकर गालियों में धूल फॉकते फिरते थे। तीसरे हजरत सैयद हुसैन थे-पक्के जुआरी, नाल के  परम भक्त, सैकंडों के दांव लगाने वाले,  स्त्री गहनों पर हाथ मॉजना तो नित्य का  इनका  काम  था। शेष दो महाशय रामसेवकलालल और चन्हदूलाल कचहरी में नौकर थे। वेतन कम, पर ऊपरी आमदनी  बहुत थी। आधी सुरापान की भेट करते, आधी भोग-विलास में उडाते। घर में  लोग  भूखे  मरे  या  भिक्षा मॉगें, इन्हें केवल अपने सुख से काम था।</p>
<p>सलाह तो हो चुकी थी। आठ बजे जब डिप्टी साहब लेटे तो ये  पॉचों  जने  एकत्र  हुए  और शराब के दौर चलने लगे। पॉचों पीने में अभ्यस्त थे। अब नशे का  रंग  जमा,बहक-बहककर  बातें  करने लगे।</p>
<p>मजीद-क्यों भाई कमलाचरण, सच कहना, स्त्री को देखकर जी खुश हो गया कि नहीं ?</p>
<p>कमला-अब आप बहकने लगे क्यों ?</p>
<p>रामसेवक-बतला क्यों नहीं देते, इसमें झेंपने की कौन-सी बात है ?</p>
<p>कमला-बतला क्या अपना सिर दूं, कभी सामने जाने का संयोग भी तो हुआ हो।  कल  किवाड़ की दरार से एक बार देख लिया था, अभी तक चित्र ऑखों पर फिर रहा है।</p>
<p>चन्दूलाल-मित्र, तुम बड़े भाग्यवान हो।</p>
<p>कमला-ऐसा व्याकुल हुआ कि गिरते-गिरते बचा। बस, परी समझ लो।</p>
<p>मजीद-तो भई, यह दोस्ती किस दिन काम आयेगी। एक नजर हमें भी दिखाओं।</p>
<p>सैयद-बेशक दोस्ती के यही मानी है कि आपस में कोई पर्दा न रहे।</p>
<p>चन्दूलाल-दोस्ती में क्या पर्दा ? अंग्रेजो को देखों,बीबी डोली से  उतरी  नहीं  कि  यार दोस्त हाथ मिलाने लगे।</p>
<p>रामसेवक-मुझे तो बिना देखे चैन न आयेगा ?</p>
<p>कमला-(एक धप लगा कर) जीभ काट ली जायेगी, समझे ?</p>
<p>रामसेवक-कोई चिन्ता नहीं, ऑखें तो देखने को रहेंगी।</p>
<p>मजीद-भई कमलाचरण, बुरा मानने की बात नहीं, अब इस वक्त तुम्हारा फर्ज है कि  दोस्तों की फरमाइश पूरी करो।</p>
<p>कमला-अरे। तो मैं नहीं कब करता हूं ?</p>
<p>चन्दूलाल-वाह मेरे शेर। ये ही मर्दों की सी बातें है। तो हम लोग बन-ठनकर आ जायॅ,  क्यों?</p>
<p>कमला-जी, जरा मुंह में कालिख लगा लीजियेगा। बस इतना बहुत है।</p>
<p>सैयद-तो आज ही ठहरी न।</p>
<p>इधर तो शराब उड़ रही थी, उधर विरजन पलंग पर लेटी हुई विचार में मग्न हो रही  थी। बचपन के दिन भी कैसे अच्छे होते हैं। यदि वे दिन एक बार फिर आ जाते। ओह। कैसा  मनौहर  जीवन था। संसार प्रेम और प्रीति की खान थी। क्या वह कोई अन्य संसार था ? क्या उन  दिनों  संसार की वस्तुए बहुत सुन्दर होती थी ? इन्हीं विचारों में ऑख झपक गयी और बचपन की एक  घटना  आंखों के सामने आ गयी। लल्लू ने उसकी गुडिया मरोड दी। उसने उसकी किताब के दो  पन्ने  फाड   दिये। तब लल्लू ने उसकी पीठ मं जोर से चुटकी ली, बाहर भागा। वह रोने लगी और लल्लू को  कोस  रही थी कि सवामा उसका हाथ पकडे आयी और बोली-क्यों बेटी इसने तुम्हें मारा है न ? यह बहुत  मार-मार कर भागता है। आज इसकी खबर लेती हं, देखूं कहां मारा है। लल्लू ने डबडबायी ऑखों से  विरजन की ओर देखा। तब विरजन ने मुस्करा कर कहा-मुझे उन्हांने कहॉ मारा है। ये मुझे कभी  नहीं  मारते। यह कहकर उसका हाथ पकड लिया। अपने हिस्से की मिठाई खिलाई और  फिर  दोनों  मिलकर  खेलने लगे। वह समय अब कहां।</p>
<p>रात्रि अधिक बीत गयी थी, अचानक विरजन को जान पडा कि कोई सामने  वाली  दीवार धमधमा रहा है। उसने कान लगाकर सुना। बराबर शब्द आ रहे थे। कभी रूक जाते फिर  सुनायी  देते। थोडी देर में मिट्टी गिरन लगी। डर के मारे विरजन के हाथ-पांव फूलने लगे।  कलेजा  धक-धक  करने लगा। जी कडा करके उठी और महराजिन चतर स्त्री थी।  समझी  कि  चिल्लाऊंगी  तो  जाग  हो जायेगी। उसने सुन रखा था कि चोर पहिले सेध में पांव डालकर देखते है तब आप घुसते  है।  उसने  एक डंडा उठा लिया कि जब पैर डालेगा तो ऐसा तानकर मारूंगी कि टॉग टूट  जाएगी।  पर  चोर  न पांव के स्थन पर सिर रख दिया। महराजिन घात में थी ही डंडा  चला  दिया।  खटक  की  आवाज आयी। चोर ने झट सिंर खीच लिया और कहता हुआ सुनायी दिया-‘उफ मार  डाला,  खोपडी  झन्ना गयी’। फिर कई मनुष्यों के हॅसने की ध्वनि आयी और तत्पश्चात सन्नाटा हो गया। इतने में और  लोग भी जाग पडे और शेष रात्रि बातचीत में व्यतीत हुई।</p>
<p>प्रात:काल जब कमलाचरण घर मं आये, तो नेत्र लाल थे और सिर में सूजन थी।  महराजिम  ने निकट जाकर देखा, फिर आकर विरजन से कहा-बहू एक बात कहूं। बुरा तो न मानोगी ?</p>
<p>विरजन – बुरा क्यों मानूगीं, कहो क्या कहती हो?</p>
<p>महराजिन – रात को सेंध पड़ी थी वह चोरों ने नहीं लगायी थी।</p>
<p>विरजन –फिर कौन था?</p>
<p>महराजिन – घर ही के भेदी थे। बाहरी कोई न था।</p>
<p>विरजन – क्या किसी कहारन की शरारत थी?</p>
<p>महराजिन – नहीं, कहारों में कोई ऐसा नहीं है।</p>
<p>विरजन – फिर कौन था, स्पष्ट क्यों नहीं कहती?</p>
<p>महाराजिन – मेरी जान में तो छोटे बाबू थे। मैंने जो लकड़ी मारी थी, वह  उनके  सिर  में<br />
लगी। सिर फूला हुआ है।</p>
<p>इतना सुनते ही विरजन की भृकुटी चढ़ गयी। मुखमंडल अरुण हो आया। क्रुद्व होकर  बोली  – महराजिन, होश संभालकर बातें करो। तुम्हें यह कहते हुए लाज नहीं आती? तम्हें मेरे सम्मुख ऐसी  बात कहने का साहस कैसे हुआ? साक्षात् मेरे ऊपर कलंक का टीका लगा रही हो। तुम्हारे बुढ़ापे  पर  दया आती है, नहीं तो अभी तुम्हें यहां से खड़े-खड़े निकलवा देती। तब तुम्हें विदित होता  कि  जीभ  को वश में न रखने का क्या फल होता है! यहां से उठ जाओ, मुझे तुम्हारा मुंह देखकर ज्वर-सा  चढ़  रहा है। तुम्हें इतना न समझ् पड़ा कि मैं कैसा वाक्य मुंह से निकाल रही हूं। उन्हें  ईश्वर  ने  क्या  नहीं दिया है? सारा घर उनका है। मेरा जो कुछ है, उनका है। मैं स्वयं उनकी चेरी हूं। उनके संबंध में  तुम ऐसी बात कह बैठीं।</p>
<p>परन्तु जिस बात पर विरजन इतनी क्रुद्व हुई, उसी बात पर घर के और लोगों को  विशवास हो गया। डिप्टी साहब के कान में भी बात पहुंची। वे  कमलाचरण  को  उससे  अधिक  दुष्ट-प्रकृतिसमझते थे, जितना वह था। भय हुआ कि कहीं यह महाशय बहू के गहनों पर न हाथ बढ़ायें: अच्छा  हो कि इन्हें छात्रालय में भेज दूं। कमलाचरण ने यह उपाय सुना तो बहुत छटपटाया, पर  कुछ  सोच  कर छात्रालय चला गया। विरजन के आगमन से पूर्व कई बार यह सलाह हुई थी, पर कमला के हठ के  आगे एक भी न चलती थी। यह स्त्री की दृष्टि में गिर जाने  का  भय  था,  जो  अब  की  बार  उसे छात्रालय ले गया।</p>
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