Category Archives: स्वामी विवेकानंद

अंतिम अधिवेशन में भाषण

इस धर्म -महासभा ने जगत् के समक्ष यदि कुछ प्रदर्शित किया हैं, तो वह यह हैं: उसने सिद्‌ध कर दिया हैं कि शुद्‍धता, पवित्रता और दयाशीलता किसी संप्रदायविशेष की ऐकांतिक संपत्ति नहीं हैं, एवं प्रत्येक धर्म मे श्रेष्‍ठ एवं अतिशय उन्नतचरित स्‍त्री-पुरूषों को जन्म दिया हैं। अब इन प्रत्यक्ष प्रमाणों के बावजूद भी कोई ऐसा स्वप्न देखें कि अन्याम्य सागे धर्म नष्‍ट हो जाएँगे और केवल उसका धर्म ही जीवित रहेगा, तो उस पर मैं अपने हृदय के अंतराल से दया करता हूँ और उसे स्पष्‍ट बतलाए देता हूँ कि शीघ्र ही सारे प्रतिरोधों के बावजूद प्रत्येक धर्म की पताका पर यह लिखा रहेगा — ‘सहायता करो, लडो मत’ ; ‘परभाव-ग्रहण, न कि परभाव-विनाश’ ; ‘समन्वय और शांति , न कि मतभेद और कलह!’ Continue reading

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बौद्‍ध धर्म : हिंदू धर्म की निष्पत्ति

हिंदू धर्म बौद्‌ध धर्म के बिना नहीं रह सकता और न बौद्‌ध धर्म हिंदू धर्म के बिना ही। तब यह देखिए कि हमारे पारस्परिक पार्थक्य ने यह स्पष्‍ट रूप से प्रकट कर दिया कि बौद्‌ध, ब्राह्मणों के दर्शन और मस्तिष्क के बिना नहीं ठहर सकते, और न ब्राह्मण बौद्‌धों के विशाल हृदय के बिना। बौद्‌ध और ब्राह्मण के बीच यह पार्थक्य भारतवर्ष के पतन का कारण हैं। Continue reading

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धर्म : भारत की प्रधान आवश्यकता नहीं

ईसाइयों को सत् आलोचना सुनने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए, और मुझे विश्‍वास हैं कि यदि मैं आप लोगों की कुछ आलोचना करूँ, तो आप बुरा न मानेंगे। आप ईसाई लोग जो मूर्तिपूजकों की आत्मा का उद्‌धार करने की निमित्त अपने धर्मप्रचारकों को भेजने के लिए इतने उत्सुक रहते हैं, उनके शरीरों को भूख से मर जाने से बचाने के लिए कुछ क्यों नहीं करते? Continue reading

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हिंदू धर्म पर निबंध

‘अमृत के पुत्रो ‘ — कैसा मधुर और आशाजनक संबोधन हैं यह! बंधुओ! इसी मधुर नाम – अमृत के अधिकारी से – आपको संबोधित करूँ, आप इसकी आज्ञा मुझे दे। निश्‍चय ही हिंदू आपको पापी कहना अस्वीकार करता हैं। आप ईश्‍वर की संतान हैं, अमर आनंद के भागी हैं, पवित्र और पूर्ण आत्मा हैं, आप इस मर्त्यभूमि पर देवता हैं। आप भला पापी? मनुष्य को पापी कहना ही पाप हैं, वह मानव स्वरूप पर घोर लांछन हैं। आप उठें ! हे सिंहो ! आएँ, और इस मिथ्या भ्रम को झटक कर दूर फेक दें की आप भेंड़ हैं। आप हैं आत्मा अमर, आत्मा मुक्‍त, आनंदमय और नित्य ! आप जड़ नहीं हैं, आप शरीर नहीं हैं; जड़ तो आपका दास हैं, न कि आप हैं जड़ के दास। Continue reading

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हमारे मतभेद का कारण

मैं हिंदू हूँ। मैं अपने क्षुद्र कुएँ में बैठा यही समझता हूँ कि मेरा कुआँ ही संपूर्ण संसार हैं। ईसाई भी अपने क्षुद्र कुएँ में बैठे हुए यही समझता हूँ कि सारा संसार उसी के कुएँ में हैं। और मुसलमान भी अपने क्षुद्र कुएँ में बैठा हुए उसी को सारा ब्रह्मांड मानता हैं। मैं आप अमेरिकावालों को धन्य कहता हूँ, क्योकि आप हम लोगों के इन छोटे-छोटे संसारों की क्षुद्र सीमाओं को तोड़ने का महान् प्रयत्‍न कर रहे हैं, और मैं आशा करता हूँ कि भविष्य में परमात्मा आपके इस उद्‌योग में सहायता देकर आपका मनोरथ पूर्ण करेंगे । Continue reading

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स्वागत का उत्तर

सांप्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी बीभत्स वंशधर धर्मांधता इस सुंदर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं, उसको बारंबार मानवता के रक्‍त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को विध्वस्त करती और पूरे पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं। यदि ये बीभत्स दानवी न होती, तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता। पर अब उनका समय आ गया हैं, और मैं आंतरिक रूप से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घंटाध्वनि हुई हैं, वह समस्त धर्मांधता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होनेवाले सभी उत्पीड़नों का, तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होनेवाले मानवों की पारस्पारिक कटुता का मृत्युनिनाद सिद्ध हो। Continue reading

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