ई-पुस्तकें (E-Books)

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धन्यवाद,

संजय।

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वरदान – विदुषी वृजरानी

प्रेमचंद

वरदान

जब से मुंशी संजीवनलाल तीर्थ यात्रा को निकले और प्रतापचन्द्र  प्रयाग  चला  गया  उस समय से सुवामा के जीवन में बड़ा अन्तर हो गया था। वह ठेके के कार्य को उन्नत करने  लगी।  मुंशी संजीवनलाल के समय में भी व्यापार में इतनी उन्नति नहीं हुई थी। सुवामा रात-रात भर बैठी  ईंट-पत्थरों से माथा लड़ाया करती और गारे-चूने की चिंता में व्याकुल  रहती।  पाई-पाई  का  हिसाब समझती और कभी-कभी स्वयं कुलियों के कार्य की देखभाल करती। इन कार्यो में उसकी  ऐसी  प्रवृति हुई कि दान और व्रत से भी वह पहले का-सा प्रेम न रहा। प्रतिदिन  आय  वृद्वि  होने  पर  भी सुवामा ने व्यय किसी प्रकार का न बढ़ाया। कौड़ी-कौड़ी दाँतो से पकड़ती और यह सब इसलिए  कि प्रतापचन्द्र धनवान हो जाए और अपने जीवन-पर्यन्त सान्नद रहे।
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वरदान – मन का प्राबल्य

प्रेमचंद

वरदान

मानव हृदय एक रहस्यमय वस्तु है। कभी तो वह लाखों की ओर ऑख उठाकर  नहीं  देखता  और कभी कौड़ियों पर फिसल पड़ता है। कभी सैकड़ों निर्दषों की हत्या पर आह ‘तक’  नहीं  करता  और कभी एक बच्चे को देखकर रो देता है। प्रतापचन्द्र और कमलाचरण में यद्यपि सहोदर भाइयों  का-सा प्रेम था, तथापि कमला की आकस्मिक मृत्यु का जो शोक चाहिये वह न हुआ। सुनकर वह  चौंक  अवश्य पड़ा और थोड़ी देर के लिए उदास भी हुआ, पर शोक जो किसी सच्चे मित्र की मृत्यु से होता है  उसे न हुआ। निस्संदेह वह विवाह के पूर्व ही से विरजन को अपनी समझता था तथापि इस विचार में  उसे पूर्ण सफलता कभी प्राप्त न हुई। समय-समय पर उसका विचार इस पवित्र सम्बन्ध  की  सीमा  का उल्लंघन कर जाता था। कमलाचरण से उसे स्वत: कोई प्रेम न था। उसका जो  कुछ  आदर,  मान   और प्रेम वह करता था, कुछ तो इस विचार से कि विरजन सुनकर प्रसन्न होगी और इस विचार  से  कि सुशील की मृत्यु का प्रायश्चित इसी प्रकार हो सकता है। जब  विरजन  ससुराल  चली  आयी,  तो अवश्य कुछ दिनों प्रताप ने उसे अपने ध्यान में न आने दिया, परन्तु जब से वह  उसकी  बीमारी  का समाचार पाकर बनारस गया था और उसकी भेंट ने विरजन पर संजीवनी बूटी का  काम  किया  था, उसी दिन से प्रताप को विश्वास हो गया था कि विरजन के हृदय में  कमला  ने  वह  स्थान  नहीं पाया जो मेरे लिए नियत था।
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वरदान – दु:ख-दशा

प्रेमचंद

वरदान

सौभाग्यवती स्त्री के लिए उसक पति संसार की सबसे प्यारी वस्तु होती है।  वह  उसी  के लिए जीती और मारती है। उसका हँसना-बोलना उसी के प्रसन्न करने के  लिए  और  उसका  बनाव-श्रृंगार उसी को लुभाने के लिए होता है। उसका सोहाग जीवन है और सोहाग का  उठ  जाना  उसके जीवन का अन्त है।

कमलाचरण की अकाल-मृत्यु वृजरानी के लिए मृत्यु से कम न थी। उसके जीवन  की  आशाएँ  और उमंगे सब मिट्टी मे मिल गयीं। क्या-क्या अभिलाषाएँ थीं  और  क्या  हो  गय?   प्रति-क्षण  मृत कमलाचरण का चित्र उसके नेत्रों में भ्रमण करता रहता। यदि थोड़ी देर के  लिए  उसकी  ऑखें  झपक जातीं, तो उसका स्वरुप साक्षात नेत्रों कें सम्मुख आ जाता।
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वरदान – प्रतापचन्द्र और कमलाचरण

प्रेमचंद

वरदान

प्रतापचन्द्र को प्रयाग कालेज में पढ़ते तीन साल हो चुके  थे।  इतने  काल  में  उसने  अपने सहपाठियों और गुरुजनों की दृष्टि में विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली थी। कालेज के जीवन का  कोई ऐसा अंग न था जहाँ उनकी प्रतिभा न प्रदर्शित हुई हो। प्रोफेसर  उस  पर  अभिमान  करते  और छात्रगण उसे अपना नेता समझते हैं। जिस प्रकार क्रीड़ा-क्षेत्र में उसका हस्तलाघव  प्रशंसनीय  था, उसी प्रकार व्याख्यान-भवन में उसकी योग्यता और सूक्ष्मदर्शिता प्रमाणित थी। कालेज  से  सम्बद्व एक मित्र-सभा स्थापित की गयी थी। नगर के साधारण सभ्य जन, कालेज के प्रोफेसर  और  छात्रगण  सब उसके सभासद थे। प्रताप इस सभा का उज्ज्वल चन्द्र था। यहां देशिक और सामाजिक विषयों  पर विचार हुआ करते थे। प्रताप की वक्तृताऍं ऐसी ओजस्विनी और तर्क-पूर्ण होती  थीं  की  प्रोफेसरों को भी उसके विचार और विषयान्वेषण पर आश्चर्य होता था। उसकी वक्तृता और उसके खेल दोनों  ही प्रभाव-पूर्ण होते थे। जिस समय वह अपने साधारण वस्त्र पहिने हुए प्लेटफार्म पर जाता, उस  समय सभास्थित लोगों की आँखे उसकी ओर एकटक देखने लगती और चित्त में उत्सुकता और  उत्साह  की  तरंगें उठने लगती। उसका वाक्चातुर्य उसक संकेत और मृदुल उच्चारण, उसके अंगों-पांग की  गति,  सभी  ऐसे प्रभाव-पूरित होते थे मानो शारदा स्वयं उसकी सहायता करती है।  जब  तक  वह  प्लेटफार्म  पर रहता सभासदों पर एक मोहिनी-सी छायी रहती। उसका एक-एक वाक्य हृदय में भिद जाता और  मुख से सहसा ‘वाह-वाह!’ के शब्द निकल जाते। इसी विचार से उसकी वक्तृताऍं  प्राय:  अन्त  में  हुआ करती थी क्योंकि बहुतधा श्रोतागण उसी की वाक्तीक्ष्णता का आस्वादन करने के  लिए  आया  करते थे। उनके शब्दों और उच्चारणों में स्वाभाविक प्रभाव था। साहित्य और इतिहास  उसक  अन्वेषण  और अध्ययन के विशेष थे। जातियों की उन्नति और अवनति तथा उसके कारण और  गति  पर  वह  प्राय: विचार किया करता था। इस समय उसके इस परिश्रम और उद्योग के प्ररेक  तथा  वर्द्वक  विशेषकर श्रोताओं के साधुवाद ही होते थे और उन्हीं को वह अपने कठिन परिश्रम का पुरस्कार  समझता  था। हाँ, उसके उत्साह की यह गति देखकर यह अनुमान किया जा सकता था कि वह होनहार बिरवा  आगे चलकर कैसे फूल-फूल लायेगा और कैसे रंग-रुप निकालेगा। अभी तक उसने क्षण भी के लिए  भी  इस  पर ध्यान नहीं दिया था कि मेरे अगामी जीवन का क्या स्वरुप होगा। कभी सोचता कि  प्रोफेसर  हो जाँऊगा और खूब पुस्तकें लिखूँगा। कभी वकील बनने की भावना करता। कभी सोचता, यदि  छात्रवृत्ति प्राप्त होगी तो सिविल सविर्स का उद्योग करुंगा। किसी एक ओर मन नहीं टिकता था।
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वरदान – कमला के नाम विरजन के पत्र

प्रेमचंद

वरदान

मझगाँव
‘प्रियतम,

प्रेम पत्र आया। सिर पर चढ़ाकर नेत्रों से लगाया। ऐसे पत्र  तुम  न  लख  करो  !  हृदय विदीर्ण हो जाता है। मैं लिखूं तो असंगत नहीं। यहॉँ चित्त अति व्याकुल हो रहा है।  क्या  सुनती थी और क्या देखती हैं ? टूटे-फूटे फूस के झोंपड़े, मिट्टी की दीवारें, घरों के सामने कूड़े-करकट के बड़े-बड़े ढेर, कीचड़ में लिपटी हुई भैंसे, दुर्बल गायें, ये सब दृश्य देखकर जी चाहता  है  कि  कहीं  चली जाऊं। मनुष्यों को देखों, तो उनकी सोचनीय दशा है। हड्डियॉँ निकली  हुई  है।  वे  विपत्ति  की मूर्तियॉँ और दरिद्रता के जीवित्र चित्र हैं। किसी के शरीर पर एक बेफटा वस्त्र नहीं है  और  कैसे भाग्यहीन कि रात-दिन पसीना बहाने पर भी कभी भरपेट रोटियॉँ नहीं  मिलतीं।  हमारे  घर  के पिछवाड़े एक गड्ढा है। माधवी खेलती थी। पॉँव फिसला तो पानी में गिर पड़ी।  यहॉँ  किम्वदन्ती है कि गड्ढे में चुडैल नहाने आया करती है और वे अकारण यह चलनेवालों से छेड़-छाड़ किया  करती  है। इसी प्रकार द्वार पर एक पीपल का पेड़ है।  वह भूतों का आवास है। गड्ढे का तो  भय  नहीं  है, परन्तु इस पीपल का वास सारे-सारे गॉँव के हृदय पर ऐसा छाया हुआ है। कि सूर्यास्त ही से  मार्ग बन्द हो जाता है। बालक और स्त्रीयाँ तो उधर पैर ही नहीं रखते! हॉँ, अकेले-दुकेले पुरुष  कभी-कभी चले जाते हैं, पर पे भी घबराये हुए। ये दो स्थान मानो उस  निकृष्ट  जीवों  के  केन्द्र  हैं।  इनके अतिरिक्त सैकड़ों भूत-चुडैल भिन्न-भिन्न स्थानों के निवासी पाये जाते हैं। इन लोगों को  चुड़ैलें  दीख पड़ती हैं। लोगों ने इनके स्वभाव पहचान किये है।  किसी भूत के विषय में कहा  जाता  है  कि  वह सिर पर चढ़ता है तो महीनों नहीं उतरता और कोई दो-एक पूजा लेकर अलग  हो  जाता  है।  गाँव वालों में इन विषयों पर इस प्रकार वार्तालाप होता है, मानों ये प्रत्यक्ष घटनाँ  है।  यहाँ  तक सुना गया हैं कि चुड़ैल भोजन-पानी मॉँगने भी आया करती हैं। उनकी साड़ियॉँ प्राय:  बगुले  के  पंख की भाँति उज्ज्वल होती हैं और वे बातें कुछ-कुछ नाक से करती है। हॉँ,  गहनों  को  प्रचार  उनकी जाति में कम है। उन्ही स्त्रीयों पर उनके आक्रमणका भय रहता है, जो बनाव  श्रृंगार  किये  रंगीन वस्त्र पहिने, अकेली उनकी दृष्टि मे पड़ जायें। फूलों की बास उनको बहुत भाती है। सम्भव नहीं  कि कोई स्त्री या बालक रात को अपने पास फूल रखकर सोये।
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वरदान – स्नेह पर कर्त्तव्य की विजय

प्रेमचंद

वरदान

रोगी जब तक बीमार रहता है उसे सुध नहीं रहती कि कौन मेरी औषधि करता है, कौन  मुझे देखने के लिए आता है। वह अपने ही कष्ट में इतना ग्रस्त रहता है कि किसी दूसरे के बात का  ध्यान ही उसके हृदय मं उत्पन्न नहीं होता; पर जब वह आरोग्य हो  जाता  है,  तब  उसे  अपनी  शुश्रषा करनेवालों का ध्यान और उनके उद्योग तथा परिश्रम का अनुमान होने लगता है  और  उसके  हृदय  में उनका प्रेम तथा आदर बढ़ जाता है। ठीक यही दशा वृजरानी की थी। जब तक वह स्वयं अपने  कष्ट  में मग्न थी, कमलाचरण की व्याकुलता और कष्टों का अनुभव न कर सकती  थी।  निस्सन्देह  वह  उसकी खातिरदारी में कोई अंश शेष न रखती थी, परन्तु यह व्यवहार-पालन के विचार से  होती  थी,  न कि सच्चे प्रेम से। परन्तु जब उसके हृदय से वह व्यथा मिट गयी तो  उसे  कमला  का  परिश्रम  और उद्योग स्मरण हुआ, और यह चिंता हुई कि इस अपार उपकार का प्रति-उत्तर क्या दूँ ?  मेरा  धर्म था सेवा-सत्कार से उन्हें सुख देती, पर सुख देना कैसा उलटे उनके प्राण ही की गाहक हुई हूं! वे  तो ऐसे सच्चे दिल से मेरा प्रेम करें और मैं अपना कर्त्तव्य ही न पालन कर सकूँ ! ईश्वर  को  क्या  मुँह दिखाँऊगी ? सच्चे प्रेम  का कमल बहुधा कृपा के भाव से खिल जाया करता है।  जहाँ  रुप  यौवन, सम्पत्ति और प्रभुता तथा स्वाभाविक सौजन्य प्रेम के बीच  बोने  में  अकृतकार्य  रहते  हैं,  वहॉँ, प्राय: उपकार का जादू चल जाता है। कोई हृदय ऐसा वज्र और कठोर नहीं हो  सकता,  जो  सत्य सेवा से द्रवीभूत न हो जाय।
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वरदान – कर्तव्य और प्रेम का संघर्ष

प्रेमचंद

वरदान

जब तक विरजन ससुराल से न आयी थी तब तक  उसकी  दृष्टि  में  एक  हिन्दु-पतिव्रता  के कर्तव्य और आदर्श का कोई नियम स्थिर न हुआ था। घर में कभी पति-सम्बंधी चर्चा  भी  न  होती थी। उसने स्त्री-धर्म की पुस्तकें अवश्य पढ़ी थीं, परन्तु उनका कोई चिरस्थायी प्रभाव उस  पर  न हुआ था। कभी उसे यह ध्यान ही न आता था कि यह घर मेरा नहं है और मुझे बहुत शीघ्र ही यहां  से जाना पड़ेगा।
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वरदान – भ्रम

प्रेमचंद

वरदान

वृजरानी की विदाई के पश्चात सुवामा का घर ऐसा सूना हो गया, मानो पिंजरे से सुआ  उड़ गया। वह इस घर का दीपक और शरीर की प्राण थी। घर वही है, पर चारों  ओर  उदासी  छायीहुई है। रहनेचाला वे ही है। पर सबके मुख मलिन और नेत्र ज्योतिहीन हो रहे है। वाटिका वही  है, पर ऋतु पतझड़ की है। विदाई के एक मास पश्चात्र मुंशी संजीवनलाल भी तीर्थयात्र करने  चले  गये। धन-संपत्ति सब प्रताप को सर्मिपत कर दी। अपने सग मृगछाला, भगवद् गीता और  कुछ  पुस्तकों  के अतिरिक्त कुछ न ले गये।
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वरदान – कायापलट

प्रेमचंद

वरदान

पहला दिन तो कमलाचरण ने किसी प्रकार छात्रालय में काटा।  प्रात:  से  सायंकाल  तक सोया किये। दूसरे दिन ध्यान आया कि आज नवाब साहब और तोखे मिर्जा के बटेरों  में  बढ़ाऊ  जोड़ हैं। कैसे-कैसे मस्त पट्ठे हैं! आज उनकी पकड़ देखने के योग्य होगी। सारा नगर  फट  पड़े  तो  आश्चर्य नहीं। क्या दिल्लगी है कि नगर के लोग तो आनंद उड़ायें और मैं पड़ा रोऊं।  यह  सोचते-सोचते  उठा और बात-की-बात में अखाड़े में था।

यहां आज बड़ी भीड़ थी। एक मेला-सा लगा हुआ था।  भिश्ती छिड़काव कर रहे थे,  सिगरेट, खोमचे वाले और तम्बोली सब अपनी-अपनी दुकान लगाये बैठे थे। नगर के मनचले युवक  अपने  हाथों  में बटेर लिये या मखमली अड्डों पर बुलबुलों को बैठाये मटरगश्ती कर रहे थे कमलाचरण  के  मित्रों  की यहां क्या कमी थी? लोग उन्हें खाली हाथ देखते तो पूछते – अरे राजा साहब! आज खाली हाथ  कैसे? इतने में मियां, सैयद मजीद, हमीद आदि नशे में चूर,  सिगरेट  के  धुऐं  भकाभक  उड़ाते  दीख  पड़े। कमलाचरण को देखते ही सब-के-सब सरपट दौड़े और उससे लिपट गये।
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